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Culture and civilization BA/BSc UNIVERSITY OF CALICUT

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Culture and civilization BA/BSc UNIVERSITY OF CALICUT
Culture and
civilization
A10
HINDI
COMMON COURSE
For
BA/BSc
IV SEMESTER
(CUCBCSS)
(2014 Admission onwards)
UNIVERSITY OF CALICUT
SCHOOL OF DISTANCE EDUCATION
CALICUT UNIVERSITY PO, MALAPPURAM, KERALA, INDIA
673 635
518
School of Distance Education
UNIVERSITY OF CALICUT
SCHOOL OF DISTANCE EDUCATION
STUDY MATERIAL
Culture and civilization
A10
HINDI
COMMON COURSE For
BA/BSc
IV SEMESTER
(CUCBCSS)
2014 Admission onwards
Prepared By :
Smt. Vanaja K.G. Head of the Department,
Associate Professor, Department of Hindi,
Zamorin s Guruvayurappan College, Calicut.
Scrutinized by :
Dr. N. Girija, Chairperson,
Board of Studies in Hindi UG
Associate Professor of Hindi
Govt. Arts & Science College,
Calicut.
Lay out :
Computer Section, SDE
©
Reserved
Culture and Civilisation
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School of Distance Education
Books for study1.
सं कृ त के व वध आयाम –संपादक- डाँ. अवधेश कुमार।
2. शबर -नरे श मे ता ।
Module -1
1. सं कृ त अथ और व प- सोती वीरे
च
2. युवाओं से- वामी ववेकान द ।
3.भारत एक है - रामधार संह दनकर।
Module -2
4. लोकत
एक धम है - डाँ. सवप ल राधाकृ णन।
5.सं कृ त और अपसं कृ त- कशन पटनायक।
Module-3
6.सामािजक
ाि त के अ दूत ी नारायण गु - डाँ.
इकबाल अहमद
7.द लत आ दोलन और अ यनकाल - डाँ.आर. श शधरन।
Module -4
Culture and Civilisation
8.शबर - ख ड का य- ी नरे श मे ता।
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School of Distance Education
Culture and Civilisation
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School of Distance Education
Module-1
1. सं कृ त अथ और व प-सोती वीरे
च
-
Paragraph questions & answers.
1. सं कृ त श द का अथ प ट क िजए।
सं कृ त श द क उ पि त सं कार श द से हु ई है । सं कार का मतलब संशोधन अथवा उ तम
बनानेवाले काय से है । सं कृ त श द का अथ है , सं करण, प र करण एवं प रमाजन। सं कृ त का भी अ भ ाय
शु
कये काय से है । इस कार सं कृ त श द सुसं कृ त अथात ् प र कृ त एवं प रमािजत ि थ त का बोध कराता
है ।
2.सं कृ त या है ?
सं कृ त कसी दे श के दशन, परं पराओं एवं व वध कलाओं के वकास का पु कल प रणाम होती है ।
उस दे श के धम ,सा ह य, मानवीय मू य एवं आदश के संचय का नाम सं कृ त है । इस कार सं कृ त पूव
परं पराओं, मा यताओं एवं मू य का सं चत कोष होती है तथा वह ऐसी
भाव को
या है जो मनु य म प व एवं द य
था पत करती है ।
3.सं कृ त के उ व और वकास पर काश डा लए ।
सं कृ त मानवीय रचना है , िजसे मानव ने अपने जीवन-यापन णाल संब धी उपयोगी त व को
वक सत कर
प दया। आ दकाल म मानव के जीवन प त संब धी आव यक स ांत वेद के मा यम से
दान कये थे। ऋ षय के
ान और वेद के स ांत के ह आधार पर आ द सं कृ त अथात ् वै दक सं कृ त ने
प धारण कया जो ाचीनतम सं कृ त है ।
अत: आ दकाल म मानव क जीवन- व ध से सं कृ त का उ व हु आ। मा यताएँ, आ थाएँ, थाएँ तथा
परं पराएँ आ द सं कृ त का आधारभूत अंग हो गई। सं कृ त मनु य क जीवन- व धय को इन समाज- वीकृ त
आदश से अवगत कराकर नयं त करने लगी। सामािजक यव था था पत करने के लए सं कृ त मनु य
को समाज के एक वशेष ढ़ाँचे म ढाल दे ती है । सं कृ त मनु य के वभाव एवं आचरण को नधा रत नयम के
आधार पर एक व श ट दशा म वक सत करती है। इस कार सं कृ त के वकास म युग –युग क मा यताएँ
समा हत है ।
4.सं कृ त को य समाज का यि त व कहते ह?
सं कृ त कसी दे श या जा त के समाज वीकृ त त व पर आधा रत जीवन प त होती है। सं कृ त
कसी दे श या जा त क आ मा के समान है । वह एक दे श या जा त क जीवन- ि ट होती है । यह सच है क कसी
मानव समुदाय क सं कृ त उसक सामािजक भावनाओं, मनोवृि तय , परं परागत मा यताओं, यवहार, र तनी त, संगीत,एवं कला कौशल का समि वत प है । इस कार कसी दे श या समाज क आचरणगत परं परा को
भी सं कृ त क सं ा द जा सकती है ।
Culture and Civilisation
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School of Distance Education
5.सां कृ तक
े
या है ? और इसके मह व पर काश डा लए।
कसी सं कृ त का चार – सार िजस दे श या
कहते है । प ट
प म कह तो –सां कृ तक
े म पाया जाता है , उसे वहाँ का सां कृ तक
े वह भौगो लक
े है िजनम वशेष
े
कार क सां कृ तक
णाल पाई जाती है और जहाँ के लोग सामा यत: एक कार के व वास और ि टकोण से भा वत होते ह, और
उनक र त-नी त म कुछ हद तक एकता पाई जाती है । यहाँ जीवन संब धी
दे ते है । कह सकते ह क सं कृ त का
येक वषय का समावेश दखाई
े समाज होता है । यहाँ सं कृ त का सीधा संब ध एक दे श, जा त, या
कसी व श ट समाज या जनसमुदाय म
च लत धा मक आ थाओं,
वृि तय , वचार धाराओं,
चय ,
यवहार , वभाव, र त- रवाज़, एवं रहन-सहन से होता है ।
यहाँ धा मक अनु ठान , कला, सा ह य, आ द क अ भ यि त है । जीवन मू य एवं जीवन के त व
पर मह व दे कर यहाँ सं कृ त को संपूण बनाने क को शश ज़ार है । जीवन दशन और जीवन प त और इनके
अ तगत आनेवाले मानवीय आदश , स गुण , मा यताओं, रा
य मू य आ द इस कार सं कृ त क आ मा
होती है ।
6. सं कृ त का उ े य या है ?
सं कृ त का मु य उ े य मनु य को सुसं कृ त एवं स य बनाना है । दे श या जा त के जीवन को प व
एवं प र कृ त प दे ना है । हमारे आचरण तथा यवहार को सुसं कृ त एवं प रमािजत करने म वह सहायता करती
है । सं कृ त मनु य म उ चादश क
त ठा करती है । सं कृ त धम, कम एवं याग के नयम उ भूत करती है।
कसी दे श क सं कृ त का ल य उसके जनसमुदाय के आचरण एवं आचार- वचार के शु ीकरण का होता है ।
उसम श टतापूवक जीवन यतीत करने क प त के आदश न हत रहते ह।
समाज म
े ठ यि त व के वकास म सं कृ त का सराहनीय सहयोग रहता है । साथ म दे श के
नवा सय क धारणाओं एवं यवहारा द क
योतक है । मूल प म शार रक, मान सक व आि मक शि तय
का वकास सं कृ त का मु य उ े य है ।
7.सां कृ तक यव था के बारे म पट रम सोरो कन तथा रवी
व व व यात समाज शा
नाथ मुकज के म त य पर काश डा लए।
ी पट रम सोरो कन ने सां कृ तक
यव था को तीन
कार म
वभािजत कया है - चेतना मक, भावना मक और आदशा मक।
चेतना मक सं कृ त इि
य पर नभर होती है । उनके अ तगत कला क तुलना म व ान एवं
ौ यो गक तथा भौ तकतावाद को अ धक मह व मलता है । पा चा य दे श म चेतना मक सं कृ त अ धक
लोक य और यापक है । यह मनु य म ऐ वय एवं वैभवपूण जीवन यतीत करने क अ धक अ भ च उ प न
करती है ।
Culture and Civilisation
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भावना मक सं कृ त का आधार इि
याँ नह ं। इसका आधार भूत- भावना, आ मा एवं परमा मा है ।
इसका उ ेशय है -मनु य को आ याि मकता क ओर ले जाना। । यहाँ आ याि मकता को धान थान दया
जाता है । यह मनु य को शा वत स य अपनाने को मदद करती है । मनु य को स ची आि मक शां त भावना मक
सं कृ त म ह मलती है । यहाँ मनु य मन क शां त क खोज म रहते ह। आ थक जीवन म धन का मह व कम
हो जाता है ।
आदशा मक सं कृ त का ज म चेतना मक तथा भावना मक सं कृ त के सामंज य से होता है । यह
भौ तकवाद एवं आ याि मकवाद क धाराओं का संगम है । इसम व ान, ौ यो गक तथा आ याि मक आदश
पर समान स मान कया जाता है य क इसम इन सब का सि म ण रहता है । इसम कसी एक वचार धारा
पर ह ज़ोर नह ं रहता। आदशा मक सं कृ त क यव था म कला तक म यथाथवाद तथा आ याि मकवाद का
सम वय रहता है । अत: आदशा मक सं कृ त न तो भौ तकवाद के ह बलकुल व
है और न आ याि मकवाद
के ह । इस कार सां कृ तक यव था म उपयु त दोन के वाद का म ण ह हम दे ख सकते है ।
8.सं कृ त और स यता का या संब ध है ? प ट क िजए।
सं कृ त एवं स यता म घ न ठ संब ध है । दोन आपस म जुडे हु ए ह
तीत होता है । वा तव म
सं कृ त एवं स यता म पया त भेद है । दोन म सामंज य है , तो भी शाि दक अथ भ न है ।
येक सं कृ त क एक स यता होती है । एक ि ट म स यता, सं कृ त का वक सत प है । स यता
का संब ध मनु य के वचार से है जब क सं कृ त का संब ध उसके आचार से है । इस कार सं कृ त एवं
स यता सदा एक दूसरे से अपृथक रहे ह और एक दूसरे के ऊपर नभर भी रहे ह। सं कृ त के योगा मक प
को
ह स यता कहा जाता है । स यता सं कृ त क वाहक है , सहगा मनी भी है ।
समाजशा
ी वौ ा नक के मतानुसार सं कृ त , मानवीय उ े य क समि ट है और स यता
मानवीय साधन क समि ट। मूल अथ म सं कृ त मानव के आ त रक गुण क
योतक है और स यता से
मानव के बा य नमाण काय का बोध होता है ।
सं कृ त का अ धक वक सत एवं ज टल प है स यता। तो स यता का आ त रक भाव है सं कृ त।
समाज क बाहर अव थाओं का नाम है , स यता। पर सं कृ त यि त के अ तर का वकास है ।
9. सं कृ त और स यता के मह व पर काश डा लए।
स यता और सं कृ त समाज और दे श के लए मह वपूण है । स यता हमारे पास होती है तथा सं कृ त
हम वयं होते ह। हमार
च हमार सं कृ त म आती है । स यता का अथ भौ तक पदाथ म है , पर सं कृ त
दय क चीज़ है । इन दोन म जीवन मू य को मु य थान है । सं कृ त अ हंसा है और मानव को ठ क रा ते
पर चलाने वाल रोशनी भी है ।
Culture and Civilisation
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मनु य के आि मक वकास और उ थान म सं कृ त तथा स यता का बडा थान है । सं ेप म कहा
जाय तो स यता बा य आवरण है और सं कृ त आ त रक । त
ु ग त म मानव के जीवन को नये रा ते म
बदलाने म सं कृ त और स यता का मह वपूण थान है ।
10.वै दक सं कृ त से या ता पय है?
सृि ट के ारं भ म ह ई वर ने मानव के पथ- दशन हे तु ,िजससे क वे े ठ मानव बन ,जीवन प त
संब धी आव यक स ांत वेद के मा यम से दान कये थे। इन स ांत के ह आधार पर आ द सं कृ त अथवा
वै दक सं कृ त ने प धारण कया जो ाचीनतम सं कृ त है ।
11.भावना मक सं कृ त के आधारभूत त व का नाम ल खए।
भावना ,आ मा,एवं परमा मा।
12. भारतीय परं परा के अनुसार सं कृ त के कतने अवयव है और ये या या ह?
पाँच। धम,दशन, इ तहास, वण,और सं कार।
13.सं कृ त श द क उ पि त कैसे हु ई?
कृ धातु के पूव सम उपसग तथा बाद म ि तन
यय लगाने पर न प न हु ई। सं कार श द से ह
सं कृ त श द क उ पि त हु ई है ।
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2.युवाओं से- वामी ववेकान द
Short & Paragraph questions & answers
1. वामी ववेकान द य कहते ह क युवा लोग को आगे आना चा हए?
युवा लोग को आगे आना च हए। अगर युवा लोग आगे नह ं आए तो सच म भारत मर जाएगा। सारे
सदाचारपूण आदश जीवन का वनाश हो जाएगा। धम के
त सार मधुर सहानुभू त न ट हो जाएगी। सार
भावुकता का लोप हो जाएगा और उसके थान पर काम पी दे व और वला सता
पी दे वी रा य करे गी। धन
उनका पुरो हत होगा। लोग लालच म आकर कुछ भी करने को तैयार होगा। अ त म मानवता इन सब क
ब लसाम ी हो जाएगी।
2. याग और सेवा कस कार भारत के रा
याग और सेवा भारत के र
य आदश बन जाते ह?
य आदश ह। इन धाराओं म ती ता उ प न करने से शेष सब अपने आप
ठ क हो जाते ह। हम सब को काम म लग जाना चा हए। इस कार ताकत अपने आप आ जाएँगे। हम दूसर के
लए जीना चा हए। दूसर के लए र ती-भर सोचने, काम करने से भीतर क शि त जाग उठती है । इससे धीरे
धीरे दय म संह का सा बल आ जाता है । ववेकान द कहते ह- य द तुम लोग दूसर के लए प र म करके मर
भी जाओ तो भी यह दे खकर मुझे स नता ह होगी। इस कार हम हर मोड पर याग और सेवा को हमारे
आदश बनाना होगा।
3. वामी ववेकान द क राय म बारत वष का पुन
थान कस कार होना चा हए ?
वाम ववेकान द कहते ह क भारत वष का पुन
से नह ं बि क आ मा क शि त के वारा। हम वनाश क
थान हमारे युवाओं से शु होगा। शार रक- शि त
वजा को नह ं लेना चा हए। शां त और
ेम को
अपनाना चा हए।
4.कैसे मुन य बु बन जाते ह?
जो पूणतया न: वाथ है ,िजसे न तो धन क लालसा है , न क त क , और न कसी अ य व तु क ह
केवल वह
यि त सबक अपे ा उ तम प से काय करता है , और मनु य जब ऐसा करने म समथ हो जाएगा,
तो वह बु बन जाएगा।
5.पूरे भारत को और संसार को हम कैसे जगा सकते ह? इसके लए हम या करना चा हए?
ववेकान द कहते है क हम मरते दम तक गर ब और पदद लत के लए जीना होगा। सहानुभू त को
हम आदश वा य बनाना चा हए। ई वर के
त आ था रखकर आगे बढ़ना चा हए। बना चालबाज़ी से दु: खय
के दद को समझना चा हए। भारत के नवयुवक को
Culture and Civilisation
त ा करनी चा हए क अपना सारा जीवन भारत के इन
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तीस करोड लोग के उ ार काय म लगा दगे। कसी व तु से डरना नह ं चा हए। न कसी बात पर कना भी
चा हए।इस कार हम संह तु य होकर भारत को और पूरे संसार को जगा सकते ह।
6. जा त के बारे म ववेकान द जी ने या कहा है ?
जा त तो यि तय क केवल समि ट ह। जा त के नाम पर भेद-भाव दखाना उ चत काय नह ं है ।
श ा के वारा
येक यि त को उपयु त बनाना ह इसका सुझाव है । अपनी च ता हम वयं ह करनी है ।
दु नया तभी प व और अ छ हो सकती है , जब हम वयं प व और अ छे हो। इस लए हम अपने आप को
प व बनाना चा हए। यह बात हम पूणता दे ती है ।
7.जीवन म इ छा शि त का मह व या है?
दु नया के उ थान के लए केवल मनु य क आव यकता है । साधारण मनु य नह ं बि क वीयवान,
तेज वी,
ासंप न और अ त तक कपट र हत नवयुवक क । इस कार के सौ नवयुवक से संसार के सभी
भाव बदल दये जा सकते ह। यहाण सब चीज़ क अपे ा इ छा शि त का अ धक भाव है । इ छाशि त के
सामने और सब शि तयाँ दब जाएँगे, य क इ छाशि त सा ात ् ई वर से नकलकर आती है । वशु और ढ़
इ छाशि त सवशि तमान है ।
इस कार इ छाशि त को लेकर हमारे नवयुवक को संग ठत होना चा हए। भारत दे श के उ थान के
लए यह एक रा ता है ।
8. वामी ववेकान द जी ने वदे श-भि त के बारे म या कहा है ?
वामी ववेकान द वदे श-भि त म व वास करते ह। इस वषय म उनका एक आदश है । बडे काम
करने के लए तीन चीज़ क आव यकता होती है । बु
और वचारशि त हम लोग क थोडी सहायता कर सकती
है । वह हम को थोडी दूर अ सर करा दे ती है और वह ं ठहर जाती है । क तु दयके वारा ह महाशि त क
ेरणा
होती है । ेम असंभव को संभव कर दे ता है । जगत ् के सारे रह य का वार ेम ह है । तो हम स दय बनना
चा हए। स दयता से कुछ भी हा सल कर सकते ह।
वामी ववेकान द कहते है क वे धा मक महासभा के लए अमे रका नह ं गए थे। दे श के जनसाधारण
क दुदशा के
तकार करने के लए गए थे। अनेक वष तक वे सम भारत म घूमते रहे पर अपने वदे शवा सय
के लए काय करने का कोई अवसर नह ं मला। इस लए वे अमे रका गए।
9.संसार को नभ कता क श ा य दे नी चा हए?
यह एक बडी स चाई है - शि त ह जीवन और कमज़ोर ह मृ यू है । हम जीवन म नभयता को
अपनाना होगा। यह बात सच है क संसार को य द एक धम क श ा दे नी चा हए ,तो वह है - नभ कता । इस
आ याि मक जगत म भय ह पतन और पाप का कारण है । भय से ह दुख होता है , यह मृ यू का कारण है तथा
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इसी के कारण सार बुराई तथा पाप होता है । सबसे पहले हमारे त ण को मज़बूत बनाना चा हए। धम इसके बाद
क व तु है । इस कार हम अपने तन और मन दोन को मज़बूत बनाकर नभय रहना चा हए।
10. वामी ववेकान द क राय म हम
कम,भि त,योग या
के सि मलन के वारा
म व प को कैसे अ भ य त कर सकते ह?
ान के वारा, इनम से कसी एक के वारा, या एक से अ धक के वारा या सब
म व प को अ भ य त कर सकते ह।
11.संसार को हम कैसे अपने पैर के नीचे लाये जा सकते है? इसके लए कन कन काय क पू त चा हए?
हर नवयुवक को अपने जीवन म एक ल य होना चा हए। हम सभी धम को वीकार करना चा हए।
सब एक है , इस ि ट से दु नया को दे खना ह हमारा कत य है । यहाँ श ा का थान भी मह वपूण है । हम श ा
के दौरान वचार क अनुभू त कर लेने क आव यकता है । यह जीवन नमाण, मनु य नमाण, तथा च र
नमाण म सहायक है । अपने भाइय का नेत ृ व नह ं बि क सेवा करने का य न हम करना है। साथ ह हमारे
वभाव म संगठन को लाना ज़ र है । हमेशा जीवन म समझौता करने का यास करना चा हए। यह है संगठन
का पूरा रह य। हम सदा के लए आ म त ठा, दलब द , और ई या को छोड दे ना चा हए। हम पृ वी माता क
तरह सहनशशील होना चा हए। इस कार हम चाह तो संसार को बहु त आगे ले जा सकते ह। यह कत य हमारे
युवाओं पर नभर है ।
12. भारत के रा
य आदश --------- है ।
याग और सेवा।
13.आ याि मक जगत म भय को पतन तथा पाप का कारण य कहते है ?
आ याि मक जगत अथवा ऐ हक जगत म भय ह पतन या पाप का कारण है । भय से ह दु:ख होता है,
यह मृ यू का कारण है तथा इसी के कारण सार बुराई तथा पाप होता है ।
14.संगठन का पूरा रह य या है?
दूसर के मत से सहमत होने को तैयार रहना और हमेशा समझौता का यास
करना । यह
संगठन का पूरा रह य है ।
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3. भारत एक है -डाँ.रामधार संह दनकरबडी बाधा है । रा
य एकता क
थापना म अब ाकृ तक बाधाएँ नह ं रहती। भाषा भेद क सम या का हल
1.भारत म दखाई पडने वाल व वधताओं पर काश डा लए।
ी रामधार संह दनकर आधु नक ह द के बहु मुखी कला के
वे मुल प से क व ह। क वता हो या नब ध अपने रा
के
तभा संप न सा ह यकार है । तो भी
त ेम और आदर कट करने का मा यम बनाये
ह। भारत एक है - उनका ऐसा एक नब ध है । इसम उ ह ने भारतवष क व वधता पर काश डालते हु ए इस
व वधता के भीतर छपी हु ई उसक एकता का प रचय दया है । उनका कहना है क भारतवष क एकता िजतनी
कट है , उसक व वधताएँ भी उतनी
य
है ।
पहले वे भारत क व वधता के बारे म बताते ह। भारतवष क व वधता पहले यहाँ के ाकृ तक ढ़ाँचे म
दखाई पडती है । यहाँ का भूभाग ाकृ तक ि ट से बलकुल भ न है । इसे तीन भाग म बाँट सकते ह। पहला
भाग है - हमालय से वं याचल तक फैला हु आ उ तर भाग। दूसरा व
या से लेकर कृ णा नद तक का दि खनी
लेटो। तीसरा भाग है कृ णा से लेकर कुमार अ तर प तक का जो ाय वीप जैसा है । इस कार कृ त ने भारत
के तीन खंड कये ह और ये तीन खंड भारत के इ तहास के तीन
भारत क
डा थल रहे ह।
ाकृ तक व वधता के कारण ाचीन काल और म य काल म उ तर और द
ण को एक
शासन के अधीन म लाने म सफलता पया त नह ं मल है । फर भी रामायण काल और महाभारत काल म
उ तर और द
णी भारत के बीच एकता व यमान थी और दोन भाग के लोग पर पर मलते-जुलते थे।
यह दे श बडा वशाल है । यहाँ बडे बडे पहाड और बडी बडी न दयाँ ह। इन पहाड और न दय के कारण
दे श म अलग अलग
े बने हु ए है। इन
े
े ीय जोश ज म लेता है । इन ांतीयता और
के भीतर रहनेवाले लोग के भीतर एक तरह क
ांतीयता और
े ीय जोश के कारण दे श म वैर-फूट का भाव बल रहा है ।
यहाँ क जलवायु म भी भ नता है । का मीर क जलवायु म य ए शया क जलवायु के समान है । पूरब
म चरापुंजी है जहाँ अ धक वषा होती है । थार क म भू म पि चम म फैल हु ई है ।
जलवायु और
े ीय सु वधा के अनुसार लोग के खान-पान और वेश-भूषा म भी अ तर पाया जाता है ।
इस भ नता को दूर करना मुि कल है ।
भारत म फैल हु ई भ न- भ न भाषाएँ व वधता का सब से बडा ल ण है । भाषाओं क व वधता के
कारण हम आपस म अजनबी के समान हो जाते ह। भाषा-भेद क सम या दे श क रा
के लए दनकर जी का सुझाव है क ह द भाषी
े
य एकता क सबसे करने
म अ ह द भाषाओं तथा अ ह द भाषी
े
म ह द
भाषा का चार हो जाए।
2.भारत क व वधता म छपी हु ई एकता पर काश डा लए।
Culture and Civilisation
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ाकृ तक भूभाग, जलवायु, खान-पान, वेश-भूषा और भाषा क
ि ट यहाँ भ नता है । इस व वधता के
भीतर यहाँ एकता छपी हु ई है । दे श क भ न भ न भाषाओं के भीतर बहनेवाल भाव-धारा एक है । रामायण
और महाभारत को लेकर भारत के ाय: सभी भाषाओं के बीच म एकता मलेगी। सं कृ त और ाकृ त क अ य
रचनाओं का भाव भी व भ न भाषाओं के सा ह य पर पडा है । दनकर जी का कहना है क भारतीय जनता क
एकता का असल आधार भारतीय दशन और सा ह य है । भारत क भाषाओं क ल पय म भ नता रहने पर भी
उदु को छोडकर अ य सभी ल पय क वणमाला एक ह है ।
यहाँ धा मक और सां कृ तक एकता भी व यमान है । उदाहरण के लए उ तर और द
सं कृ त के मि दर दखाई पडते है । उ तर और द
ण म एक ह
ण के लोग के जीवन-दशन म भी भ नता नह ं। वे एक धम
के अनुयायी और एक सं कृ त के भागीदार है ।
सं कृ त क
ि ट से यहाँ के मुसलमान ह दुओं के बहु त कर ब है । भारत के मुसलमान के भीतर भी
ह दुओं के जैसे ह धम को लेकर एक तरह क आपसी एकता है ।
येक दे श क एक नजी सां कृ तक वशेषता होती है । यह वशेषता
येक दे शवासी क चाल-ढाल,
बातचीत, रहन-सहन,खान-पान, तौर-तर के और आदत से कट होती रहती है । भारत क सां कृ तक एकता का
यह माण है क कोई भी भारतवासी चाहे वह ह दु हो, फारसी हो या मुसलमान अ य दे श के लोग के बीच म
खप नह ं सकता। वह भारतवासी ह बना रहता है । उसे आसानी से पहचाना जा सकता है ।
यह सां कृ तक एकता भारत को एक रखे हु ए है । भ न भ न धमवाले और भाषा भाषी होने पर भी
रहन-सहन और आचार- वचार और दशन पर आधा रत सां कृ तक एकता के कारण हम मान सकते ह क भारत
एक है । उसक व वधता म एकता मौजूद है ।
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Module-2.
4.लोकत
1.लोकत
एक धम है- डाँ. सव प ल राधाकृ णन
एक धम है नामक नब ध म डाँ.राधाकृ णन जी का म त य य त क िजए ।
डाँ.सवप ल राधाकृ णन का ज म सत बर 1888 को हु आ। राधाकृ णन जी एक े ठ दाश नक एवं
राजनी त
थे। चरकाल तक दे श- वदे श म ोफेसर रहे , बाद म वदे श म राजदूत के प म कायरत रहे । आप
भारत के उपरा
प त और रा
प त रह चुके है । डाँ राधाकृ णन ने भारतीय दशन का दे श- वदे श म चार कया
और उसक यावहा रकता पर वशेष ज़ोर दया। भारतीय सं कृ त का वा त वक व प उ ह ने व व के सामने
तुत करने का य न कया। लोकत
एक धम है
कुछ वचार म संक लत है , िजसम लोकत
1947 म
राजनी तक
नब ध डाँ.राधाकृ णन क पु तक भारतीय सं कृ त:
के व वध पहलुओं पर वचार य त है ।
वतं ता
ाि त के बाद
भारत को शासन के लए बहु त सार बात क
आव यकता पडी। आ म यागी नेत ृ व, ईमानदार तथा कुशल नाग रक सेवा, अनुशा सत सेना तथा पु लस दल ,
वशेष , औ यो गक ब धक , कुशल
मक और कृ ष- ान रखनेवाले कसान क ज़ रत पडी। दे श भि त
क शि तमती भावना कायम रहने के कारण एक हद तक इस महान दे श का होने क भावना और उसके होने का
अ भमान का बोध जन मानस म जगा सका । बीच बीच म अधोग तय एवं अ ध-ग लय म गरने के बावजूद
लगभग चाल स या पचास श तय तक यह दे श िजन महती परं पराओं के लए खडा रहा है , उ ह अपने अ दर
वक सत करने क आव यकता है ।
लोकस ता के व भ न पहलू होते ह। यह राजनी तक यव था है , यह एक आ थक रा ता है , यह
जीवन क एक नै तक णाल है । राजनी तक यव था म हमने वय क मता धकार को
यि त को जो एक वशेष आयु का हो, फर उनक शै
मता धकार ा त है ।
हण कया है ।
णक यो यताएँ, सु वधाएँ, स पि त कुछ भी हो ,
येक यि त परमा मा क एक चनगार है । आज राजनी तक लोकत
धम के भेद-भाव को लाँघ जाता है ।
येक
वग, जा त एवं
येक मानव- ाणी सव च जीवन के लए शि तमान उ मीदवार है ।
राधाकृ णन जी का आ वान है क हम सब यि तय को पूण, वतं एवं समृ जीवन जीने का अवसर दे ना
चा हए। न नतम सां कृ तक एवं आ थक प रि थ तयाँ पैदा कर जाने के लए ह हमारे वधान म सावदे शक
श ा का ल य रखा गया है । हम व ान एवं
ौ यो गक के आ मण तथा जीवन के य
ीकरण
वारा
मानवीय ा णय के यि त व को कुचले जाने या कम कए जाने का भी मौका नह ं दे ना चा हए।
समाज वाद का अथ सब के लए समान अवसर पर सु वधाएँ दे ना है । जब हम कहते ह क सब मनु य
को भोजन, व
एवं आ य क सु वधा मलनी चा हए तब हम लोकतां क आदश के आ थक प
है । कोई भी मुन य ,जो अपने दे श के
पर ज़ोर दे ते
त भावना रखता है ; तब तक सुखी या संतु ट नह ं हो सकता जब तक वह
इस भयानक दुदशा और गर बी को दे ख रहा है ।
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अब भी लोकत
एक आदश ह बना हु आ है । हम उसम कुछ सामािजक और आ थक साम ी डालने
क चे टा करते ह तो यह लोकत
अपनी रा
का आ थक प
बन जाता है । आ थक लोकत
क उपलि ध के लए हम
य संपि त , अपनी कृ ष संब धी उपज और औ यो गक उ पान बढ़ाना चा हए। पंचवष य योजनाएँ
इ हंल य क
ाि त के लए है । सामू हक वकास काय म ा य पुनरचना के उ े य को लेकर चल रहे ह।
नै तक पकड या नै तक वृि त पर काश डाला जाय तो पता चलेगा क
येक मानव ाणी म ववेक
का अंश है । हम यह व वास रखना चा हए क हम सदा ह ठ क नह ं हो सकते। कभी हमारे वरोधी भी ठ क हो
सकते ह। हमारे वरो धय म भी कुछ गुण हो सकते है । यह भावना लोकत
हम पर लागू करता है । हम अपनी
सम याय ववेक के साथ बना कटु ता के हल करने क चे टा करनी चा हए।
जब हम दे खते ह क मानवता के भ व य को
भा वत करनेवाल
वशाल सम याओं के आमने-
सामने खडे है : तब हमारे लए इतना जानना ज़ र है क काल सबसे बडा या धहता है । य द हम मानवीय
वभाव क लोच म समय क
या ध शमनकार शि त म सामािजक एवं राजनी तक सं थाओं क
प रवतनीयता म और सबके ऊपर सवसाधारण क स द छा म व वास हो तो जो सम याय आज हमको इतनी
भयावह र त से वभिजत कर रह है , वे ह कुछ समय बाद वशु
राधाकृ णन जी के अनुसार हमारा रा
सै ां तक या शा
ीय तीत होने लगगे।
एक है और अख डनीय है । इसी लए अपने गौरव के दन म
हम व भ न धम के बीच स ह णुता और समझदार से काम ले सके थे। य द आज हम उन श ाओं को भूल
जाते ह और अपनी वग य न ठाओं को बढ़ाते-चढ़ाते ह तो न चय ह भ व य अंधकारमय है ।
लोकत
एक राजनी तक यव था है जो लोग को समान मानती है। यह एक आ थक माँग है जो इस
दे श और इस दु नया के सवसामा य लोग क अ भमान का बोध जन मानस म जगा सका । बीच बीच म
अधोग तय एवं अ ध-ग लय म गरने के बावजूद लगभग चाल स या पचास श तय तक यह दे श िजन महती
परं पराओं के लए खडा रहा है , उ ह अपने अ दर वक सत करने क आव यकता है ।
2. लोकस ता के व भ न पहलू कौन कौन से है ?
लोकस ता के व भ न पहलू होते ह। यह राजनी तक यव था है , यह एक आ थक रा ता है , यह
जीवन क एक नै तक णाल है । राजनी तक यव था म हमने वय क मता धकार को
यि त को जो एक वशेष आयु का हो, फर उनक शै
मता धकार ा त है ।
हण कया है ।
णक यो यताएँ, सु वधाएँ, स पि त कुछ भी हो ,
येक यि त परमा मा क एक चनगार है । आज राजनी तक लोकत
धम के भेद-भाव को लाँघ जाता है ।
येक
वग, जा त एवं
येक मानव- ाणी सव च जीवन के लए शि तमान उ मीदवार है ।
राधाकृ णन जी का आ वान है क हम सब यि तय को पूण, वतं एवं समृ
जीवन जीने का
अवसर दे ना चा हए। न नतम सां कृ तक एवं आ थक प रि थ तयाँ पैदा कर जाने के लए ह हमारे वधान म
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सावदे शक श ा का ल य रखा गया है । हम व ान एवं ौ यो गक के आ मण तथा जीवन के य
ीकरण
वारा मानवीय ा णय के यि त व को कुचले जाने या कम कए जाने का भी मौका नह ं दे ना चा हए।
समाज वाद का अथ सब के लए समान अवसर पर सु वधाएँ दे ना है । जब हम कहते ह क सब मनु य
को भोजन, व
एवं आ य क सु वधा मलनी चा हए तब हम लोकतां क आदश के आ थक प
है । कोई भी मुन य ,जो अपने दे श के
पर ज़ोर दे ते
त भावना रखता है ; तब तक सुखी या संतु ट नह ं हो सकता जब तक वह
इस भयानक दुदशा और गर बी को दे ख रहा है ।
अब भी लोकत
एक आदश ह बना हु आ है । हम उसम कुछ सामािजक और आ थक साम ी डालने
क चे टा करते ह तो यह लोकत
अपनी रा
का आ थक प
बन जाता है । आ थक लोकत
क उपलि ध के लए हम
य संपि त , अपनी कृ ष संब धी उपज और औ यो गक उ पान बढ़ाना चा हए। पंचवष य योजनाएँ
इ हंल य क
ाि त के लए है । सामू हक वकास काय म ा य पुनरचना के उ े य को लेकर चल रहे ह।
नै तक पकड या नै तक वृि त पर काश डाला जाय तो पता चलेगा क
येक मानव ाणी म ववेक
का अंश है । हम यह व वास रखना चा हए क हम सदा ह ठ क नह ं हो सकते। कभी हमारे वरोधी भी ठ क हो
सकते ह। हमारे वरो धय म भी कुछ गुण हो सकते है। यह भावना लोकत
हम पर लागू करता है। हम अपनी
सम याय ववेक के साथ बना कटु ता के हल करने क चे टा करनी चा हए।
3.लोकत
लोकत
से या ता पय है ?
एक राजनी तक यव था है जो लोग को समान मानती है । यह एक आ थक माँग है जो इस
दे श और इस दु नया के सवसामा य लोग क आ थक दशा कोऊपर उठाने क माँग करती है । यह जीवन क
नै तक णाल है िजसम दूसर के
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त म ता यवहार करने क आशा हमसे क जाती है ।
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5.सं कृ त और अपसं कृ त - कशन पटनायक
1.सं कृ त और अपसं कृ त नामक लेख म सं कृ त के कौन से पहलू को उजागर कया है ?
समाजवाद आ दोलन के पूवका लक कायकता के प म स
य कशन पटनायक 32 वष क आयु म
1962 म संबलपुर से लोकसभा के सद य चुने गये। सा ह य और दशन म दलच पी रखनेवाले कशन पटनायक
ह द , अं ेज़ी और उ डया म लखते रहते ह। अं ेज़ी और ह द के मुख प काएँ जैसे क पना, धमयुग आ द
म उनके बहु त से लेख का शत है ।
सं कृ त और अपसं कृ त नामक लेख म भूम डल करण से जीवन के तमाम
े
म आए बदलाव को
,खास करके सां कृ तक प रवतन को रे खां कत कया गया है। लेखक क राय म इसे प रवतन न कहकर
अपसं कृ त कहना उ चत होगा। मनु य क
े ठता दशाने के लए अ सर मनु येतर जीव जगत से उसक
तुलना क जाती है । मनु य के जीवन को पशुओं के जीवन से बेह तर माना गया है । सं कृ त ह इसका कारण है ।
मनु य अपना हर एक काम- ज म,मृ यू, भोजन, यौन-संपक सब कुछ अपनी बनाई हु ई एक सं कृ त के तहत
करना चाहता है । मनु य अपने को केवल समाज के साथ जोडकर नह ं सोचता है , वह अपने को सचेत ढ़ं ग से पूरे
मा ड के साथ जोडकर दे खना चाहता है । मनु य सीधे कृ त के नयम से नद शत होकर नह ं चलता। उसके
अपने नी त- नयम होते ह। उसक यह वाय तता उसक सं कृ त है ।
सं कृ त म बहु त सा आडंबर भी होता है । उसक बु नयाद अंश को मब य कहते ह। जीवन को व थ,
सु दर और ग तशील बनाने के जो त व होते ह उनको मू य माना गया है । मू य के बहु त सारे सामािजक और
यावहा रक प हो सकते ह, ले कन वा तव म ये तीन मू य ह। बा य ि थ त के साथ स यक संयोग था पत
करनेवाला त व सौ दय है । दे ह और मन के अ तर कोई अवरोध न रहना
वा
य है । तीसरा मू य है
ग तशीलता, जो मुन य क आगे बढ़ने क इ छा है , यह शार रक, मान सक, आ त रक,बा य कई तर पर
स
य होती है । मनु य का जो यवहार जीवन- वकास क धारा का मददगार है वह वह मू य है , वह सु दर और
नै तक है ।
आ दम काल से ह मनु य अपनी सं कृ त बनाने म लगा हु आ है । अलग-अलग भौगो लक ि थ तय
म अलग-अलग सं कृ तयाँ बनी ह, उनका वकास हु आ है और पतन भी। सं कृ तय म भ नता रखते हु ए भी ये
मनु य जीवन को तथा सामू हक जीवन को सु दर, व थ, और ग तशील बनाने क को शश ह। सं कृ तय के
उ थान और पतन के अलग- अलग चरण पाई जाती है । कसी समुदाय के अ दर नेत ृ व करनेवाला समूह जब
अपने समूह या वग को यादा मज़बूत या व श ट बनाने के लए मयादाओं को या संतुलन को भंग करता है तब
सं कृ त का ढाँचा बदल जाता है । इसी तरह दु नया म सैकड सं कृ तयाँ व भ न अव थाओं म पाई जाती ह।
आधु नक युग म व भ न सं कृ तय म जो प रवतन हु ए है , उनम सबसे
मुख है —पि चम क
आधु नकता के दबाव से गैर पि चमी समाज का प रवतन। पि चम के समाज और सं कृ त पर आधु नक
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व ान का भाव
य
प से पडा। ले कन भारतीय समाज पर पि चम क आधु नक स यता और सं कृ त
का दबाव पडा। चीन तथा जापान पर पि चमी सं कृ त का दबाव कम रहा य क वे पराधीन नह ं थे। इसका
प ट उदाहरण भाषा के
े म है । जापान और चीन म आधु नक करण क भाषा उनक अपनी भाषा रह ।
भारत,पा क तान और बंगलादे श ने एक यूरोपीय भाषा को ह अपने आधु नक करण क भाषा के
प म
अपनाया।
सं कृ त म वकृ तयाँ दो तरह से आ सकती है: समाज के अ दर कसी समूह के आ धप य के वारा
सां कृ तक संतुलन पर आ ामक दबाव से या बा य समाज के आ धप य से। पि चम के आ धप य से पहले ह
भारत म सं कृ त म वकृ तयाँ आने लगी थी। भारत क सं कृ तय के स यक व वतं
गई थी। समाज के अ दर
वकास क धारा क
ा मणवाद का आ धप य सबसे बडा दबाव था। इससे भारत का सां कृ तक बल
इतना टू ट गया क मुसलमान के काल म जो बाहर का आ मण हु आ उसका मुकाबला भारतीय समाज नह ं कर
सका।
दो सं कृ तय के म ण से एक नई धारा उ प न होने क
ग तशील बनाने के सं कृ त के तीन मूल त व सुर
या म जीवन को सु दर, व थ और
त रहते है , तब म ण से एक नई और सुसं कृ त पैदा होती
है । जो व थ है वह थूलहो जाता है जो ग तशील है वह आ ामक और डरावना हो जाता है ।
नै तकता और सं कृ त के साथ मनु य के मन का संब ध है । बु
सम
या का
तफलन मन पर होता है । सुख-दुख को कैसे
से मनु य स
य होता है , ले कन
हण कर, कैसे झेल, कैसे नयं त कर या पैदा
कर, ये सार बात सं कृ त से संबि धत है । स यता और सं कृ त मनु य क दुख शमन क
वृि त का प रणाम
है , ले कन जब वह कृ त और मनु य स यक संब ध छ न करके उनको सुख के साधन के तौर पर यवहार
करता है और मनु य समाज म आ धप य का के
था पत करता है ।
जो लोग सं कृ त क समी ा करते ह, अपसं कृ त पर बहस करते ह या नई सं कृ त का उदय चाहते
है , उ ह मानव के उपयु त आचरण और संब ध के बारे म मू य न पत करने ह गे। सं कृ त क समझ को
अगंर हम इस सम
प म ल तो केवल नाटक,सा ह य या धम, सं कृ त के उपदान नह ं है बि क आ थक और
राजनै तक सं थाएँ, श ा और यापार क
णा लयाँ- ये सब सं कृ त के उपदान है ।
इस व त क अपसं कृ त क चचाके अ दर नई आ थक नी तय और लोबीकरण क अथनी त क
चचा बार बार आ जाती है। नई आ थक नी त का
न सां कृ तक
न नह ं है ,ले कन सं कृ तका भ व य
लोबीकरण क नी तय के वारा तेज़ी से भा वत हो रहा है य क नई आ थक नी तयाँ व तुजगत से मनु य
के संब ध के, मनु य के यौन संब ध को तथा अ य बु नयाद मानवीय संब ध को कुछ खास दशाओं म ले
जाना चाहती है ।
व व के पैमाने पर मनु य को आपस म जोडना मानव जा त का ाचीन ल य है । सं कृ त और धम
को ह इसके मा यम के
प म माना गया है । आधु नक युग का शासक वग दावा करता है क वह यापा रक
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सं थाओं के वारा सम
मानव जा त को एक कृ त कर दे गा। पर वा तव म यापार के वारा नह ं ,सं कृ त के
वकास के वारा ह मनु य का जगतीकरण होगा।
Paragraph questions & answers.
1.मू
य कसे कहते ह और उसके बु नयाद त व कौन कौन से है ?
सं कृ त म बहु त सा आडंबर भी होता है । उसक बु नयाद अंश को मब य कहते ह। जीवन को व थ,
सु दर और ग तशील बनाने के जो त व होते ह उनको मू य माना गया है । मू य के बहु त सारे सामािजक और
यावहा रक प हो सकते ह, ले कन वा तव म ये तीन मू य ह। बा य ि थ त के साथ स यक संयोग था पत
करनेवाला त व सौ दय है । दे ह और मन के अ तर कोई अवरोध न रहना
वा
य है । तीसरा मू य है
ग तशीलता, जो मुन य क आगे बढ़ने क इ छा है , यह शार रक, मान सक, आ त रक,बा य कई तर पर
स
य होती है । मनु य का जो यवहार जीवन- वकास क धारा का मददगार है वह वह मू य है , वह सु दर और
नै तक है ।
2.आधु नक युग क सां कृ तक प रवतन का मुख कारण या है?
आधु नक युग म व भ न सं कृ तय म जो प रवतन हु ए है , उनम सबसे
मुख है —पि चम क
आधु नकता के दबाव से गैर पि चमी समाज का प रवतन। पि चम के समाज और सं कृ त पर आधु नक
व ान का भाव
य
प से पडा। ले कन भारतीय समाज पर पि चम क आधु नक स यता और सं कृ त
का दबाव पडा। चीन तथा जापान पर पि चमी सं कृ त का दबाव कम रहा य क वे पराधीन नह ं थे। इसका
प ट उदाहरण भाषा के
े म है । जापान और चीन म आधु नक करण क भाषा उनक अपनी भाषा रह ।
भारत,पा क तान और बंगलादे श ने एक यूरोपीय भाषा को ह अपने आधु नक करण क भाषा के
प म
अपनाया।
3.सं कृ त म वकृ तयाँ कस तरह आ जाती है?
सं कृ त म वकृ तयाँ दो तरह से आ सकती है: समाज के अ दर कसी समूह के आ धप य के वारा
सां कृ तक संतुलन पर आ ामक दबाव से या बा य समाज के आ धप य से। पि चम के आ धप य से पहले ह
भारत म सं कृ त म वकृ तयाँ आने लगी थी। भारत क सं कृ तय के स यक व वतं
गई थी। समाज के अ दर
वकास क धारा क
ा मणवाद का आ धप य सबसे बडा दबाव था। इससे भारत का सां कृ तक बल
इतना टू ट गया क मुसलमान के काल म जो बाहर का आ मण हु आ उसका मुकाबला भारतीय समाज नह ं कर
सका।
4.हमारे युग क दो चुनौ तयाँ या या है?
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हमारे युग क दो चुनौ तयाँ ह। (क) मनु य क सं कृ त और सां कृ तक मानद ड को हम नए सरे से
प रभा षत कर। (ख) यापार और वकास क नी तय को सां कृ तक ल य के अनु प बनाएँ। मनु य-मनु य
के बीच क वषमताओं को दुल य बनाकर , दे श के बीच क वषमताओं को अलं य बनाकर हम यापार का
लोबीकरण हा सल कर सकते ह, मनु य का जगतीकरण नह ं। मनु य का जगतीकरण एक सां कृ तक ल य
है ।
5.सुखा वेषण से या ता पय है ?
सुख-दुख के बारे म दु नया म दो तरह क मा यताएँ चलती ह।उनम सब से अ धक च लत है वह
सुखा वेषण का है । सुख ह
ा य है , उसक तलाश होनी चा हए; हालाँ क उसके साथ-साथ सुख क अलग अलग
प रभाषाएँ भी बतलाई हु ई है ; अ धकांश धा मक दशन म इससे मलती जुलती बात पाई जाती है ।
6. दुख के बारे म गौतम बु क राय या है?
गौतम बु का मानना है क मनु य क मूल ि थ त दुख क है । दुख का शमन होना चा हए। दुख शमन
क व ध ह नै तकता है । वह धम है । हम कह सकते ह दुख शमन होने से मनु य िजस ि थ त क ओर ग त
करे गा वह सुख और दुख से अलग होगी, वहाँ अ वेषण एक तीसर चीज़ का होगा। सुखा वेषण का प रणाम
वला सता , थूलता , भ ापन और ताम सक ि थ तय क ओर होता है ; ले कन दुख के दशन का प रणाम
दा र य, आ मस तोष और जडता भी हो सकता है । सुखा वेषण के दशन पर आधा रत स यता-सं कृ त को तो
हम दे ख रहे ह। शायद दुख शमन क मानवीय को शश से जो एक यव था खड़ी होती है , वह सं कृ त हो।
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Module-3.
6.सामािजक
ां त के अ दूत- ी नारायण गु
ी नारायण गु का ज म 1856 ई. म चे ब ंती नामक थान पर हु आ था। यह त वन तपुरम से
लगभग बारह कलोमीटर क दूर पर ि थत है । उनके पता माडन और माता कु ी थी। पता अ यापन का काय
करते थे तथा वै य भी करते थे।
काल क कठोर आव यकताएँ ह महा माओं को ज म दे ती है ।
ी नारायण गु का ज म भी ऐसी
प रि थ त का योतक है । उस समय समाज व भ न धम , जा तय , उपजा तय और वग म वभािजत था।
केरल म ह दुओं के दो मुख जा तयाँ थी- नायर और ई वा। नायर जा त को समाज म उ च थान ा त था
और उनका संब ध सवण जा त के साथ था। ई वा जा त के लोग अवण, अ पृ य और द लत माने जाते थे। ी
नारायण गु का ज म ई वा जा त म हु आ था। उस समय सवण से 32 फूट क दूर पर ई वा कोरहना पडता था
और संपक म आने पर अशु
घो षत कर दया जाता था। ई वा क जनसं या अ धक थी। इनका
धान
यवसाय ना रयल और खजूर से ताडी नकालना और कृ ष था।
आयुव दक प त का संपूण सा हतय सं कृ त म उपल ध था। ई वा जा त ने सं कृ त पढ़कर इसको
अपना लया। जन साधारण म आयुवद और संसकृ त को जी वत रखने का ेय ई वा जा त के वै य को है।
नारायण गु का मामा संसकृ त
ी
और वै य थे।
गु जी को बचपन म नानू नाम से पुकारा जाता था। बहु त शरारती था। दे व के चढावे के लए रखे फल
और म ठा न लेकर मज़े से खाता और कहता य द म संतु ट होऊँगा तो भगवान भी स न होगा। नानू जब
छह वष का था तो उनके एक चाचा क मृ यू हु ई। दूसरे दन वह घर से नकल गया और जंगल म छपकर सोचवचार म य त हो गया। सभी तलाश के अ त म कसी ने सूचना द क वह जंगल म है , तो मामा-मामी तुरंत
जंगल गये और उ ह घर लाया। पूछने पर यह उ तर मला क –चाचा क मृ यू पर आप सब बहु त दु:खी थे,
क तु दूसरे दन ह आप सब फर सामा य हो गए। इस घटना से प ट होता है क वे अपनी उ
से पहले ह
दाश नक थे।
ी नारायण गु क सु यवि थत श ा पाँच वष क आयु म शु
हु ई। गु का नाम चब ती मू त
प लै था जो सवण थे। उ च श ा के लए उ ह 1876 ई. म क नागप ल के आ म म भेजा गया। वण भेद के
कारण नायर ब चे गु के आ म म ह रहते थे और ई वा ब च को आ म के बाहर रहना पडता था। इस लए
वरनप ल नामक समृ और उदार प रवार म रहना पडा। नानू के कुशा बु
के कारण गु उ ह छा
का नेता
बनाया। घ न ठ म कु हु कु हु प णकर था। इसी बीच नानू को पे चश क बीमार हो गई तो मामा उ ह घर
वापस लाए। इस कार नानू का व याथ जीवन समा त हो गया।
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नानू घुम कड कृ त के थे और धम परायण जीवन यतीत करने के इ छुक थे। ले कन संबि धय ने
समझा बुझाकर उनसे शाद करवायी। ले कन बहु त ज द ह वे
मचय माग पर लौट आए। परमत व क खोज
म गु जी एकाक या ी के समान भटकते रहे । अ धकांश समय उ ह ने अकेले जंगल म फल-क दमूल आ द
खाकर बताया। योगाचाय अ यावजी क राय वीकार करके म
वामला के उ च शखर पर एक वशाल क तु
चार ओर से घर हु ई हवादार गुफा मे तप या और योगा यास कया। फर वह छोडकर सामािजक सेवा हे तु आ
गए। उ ह ने कभी यह नह ं कहा क गृह थ जीवन को छोडकर ई वर के साथ अलौ कक तादा
य करना चा हए।
उ ह ने भ त के संब ध म यह कहा है :
पृ वी ह उसके बछौना है , उसक भुजाएँ उसक त कया।
उस ज़माने म मि दर म वेश केवल उ च जा त को मलता था।
येक जा त को अपनी
ेणी के
आधार पर एक दूसरे के पीछे पूजा थल से नि चत दूर पर ह खडा होना होता था। ा मण म भी उ चतम वग
के ा मण को ह मि दर म पूजा का अ धकार था। यह सब गु जी को अस य लगा और एक शवरा ी के कुछ
दन पहले घोषणा क क वे शव लंग क
थापना करगे। ी नारायण गु ने शवरा ी के दन ठ क अध रा ी को
नद म गोता लगाया और एक प थर का टु कडा अपने व
थल से चपकाए नद के बाहर आए और उसे लेकर
यान म न अव था म आँख मूँदे तीन खंडे तक खडे रहे । ात: तीन बजे गु जी ने शव लंग को पी ठका पर
था पत कर उसका अ भषेक कया। गु जी ने मि दर म वेश वजन क
था को वीकार नह ं कया और ई वा
जा त के लए मि दर का नमाण कया। मि दर के पास तालाब नमाण क अपे ा नान गृह बनवाने का
सुझाव दया। मि दर के चार ओर बगीचे लगवाए। मि दर म जो चढ़ावा पैसे के प म मलता, उसी लोग के
क याण काय के लए खच करने क बात कह । धम
थ का पु तकालय हर मि दर के साथ होना चा हए तथा
मि दर के पुजार न न वग के होने चा हए। यह उनके स दे श थे।
ी नारायण गु जी ने 1912 . म वै दक कूल के साथ-साथ सर वती मि दर क भी थापना क ।
ई वा जा त म भी कई उपजा तयाँ ह जैसे थया, ब लवा आ द। इन म अ तजातीय ववाह नह ं करते थे, क तु
ी नारायण गु ने व भ न उपजा तय को एक समुदाय के प म ढालने म सफलता ा त क । उ ह ने वधवा
ववाह को बढ़ावा दया।
ी श ा पर वशेष बल दया। ताल ( मंगल सू ) बाँधने क खच ल
कहकर ब द करवा दया। लड़क के वय क होने पर जो बडी बडी दावत दे ने क
था को नरथक
था थी, उसका उ ह ने वरोध
कया और उसे समा त करने म सफलता पाई।
ी नारायण गु जी ने सम त मानव जा त के लए जीवन भर काम कया। महान
स दे श है : जो भी धम हो , यह पया त है क मनु य स गुण स प न हो। उनका महाम
ां तकार स त का
था- एक जा त एक
धम और एक ई वर मानव का।
गु जी ने सत बर 1928 ई. क स
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या चार बजे 72 वष क आयु म समा ध हण क ।
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Paragraph questions & answers1.
आयुवद प त को ई वा क दे न या है ?
सं कृ त आयुवद शा
के व वान न बू त र ा मण हु आ करते थे, क तु उनक सं या बहु त कम
थी और उन तक जन-साधारण नह ं पहू ँच पाते थे। आयुव दक प त का संपूण सा ह य सं कृ त म उपल ध था।
अथात आयुव दक प त को जानने के लए सं कृ त भाषा का
ान अ य त आव यक था। इस मह वपूण काय
को ई वा जा त के लोग ने नभाया। व तुत: केरल का संपूण भू-भाग ई वा वै य और सं कृ त
से भरा था।
जन-साधारण म आयुवद और सं कृ त को जी वत रखने का ेय ई वा जा त के वै य को ह है ।
2. नानू बचपन से ह दाश नक वषय पर वचार करते थे। इसका खुलासा कब हु आ?
जब नानू छह वष का बालक था तो उसके कसी नकट संब धी क मृ यू हो गई। घर म सभी लोग
काफ दु:खी हु ए।नानू दुसरे दन घर से नकल गया और जंगल म छपकर सोच वचार म य त हो गया।
घरवाल ने नानू को तलाशा, ले कन नह ं मला। बाद म एक यि त ने आकर सूचना द क नानू जंगल म
छपकर बैठा है । मामा-मामी तुर त जंगल म गए और नानू को वचारम न पाया। उसे घर पर लाए और पूछा क
तुम जंगल म छपकर य बैठे थे? नानू ने उ तर दया – चाचा क मृ यू पर आप सब बहु त दुखी थे, क तु दूसरे
दन ह आप सब फर सामा य हो गये। इस घटना से प ट है क
ी नारायण गु अपने उ
से पहले ह
दाश नक थे और बडे-बूढ से दाश नक वषय पर तक – वतक भी करते थे।
3.गु जी क श ा-द
ा कैसे संप न हु आ?
ी नारायणगु क सु यवि थत श ा पाँच वषक आयु म शु
हु ई। गु का नाम चब ंती मू ता
प लै था जो सवण थे। उ च श ा के लए उ ह 1876 ई. म क नागप ल के आ म म भेजा गया। वण भेद के
कारण नायर ब चे गु के आ म म ह रहते थे और ई वा ब च को आ म के बाहर रहना पडता था। इस लए
वरनप ल नामक समृ और उदार प रवार म रहना पडा। नानू के कुशा बु
के कारण गु उ ह छा
का नेता
बनाया। घ न ठ म कु हु कु हु प णकर था। इसी बीच नानू को पे चश क बीमार हो गई तो मामा उ ह घर
वापस लाए। इस कार नानू का व याथ जीवन समा त हो गया।
4. ी नारायण गु के गृह थ जीवन कहाँ तक साथक रहा?
नानू घुम कड कृ त के थे और धम परायण जीवन यतीत करने के इ छुक थे। खाल समय म गीता
वाचन कया करते थे। म तमौलापन और आ याि मक तरं ग को दे खकर उनके संबि धय ने उ ह सुधारने के
लए उनका ववाह करने का नणय लया। पहले नानू ववाह के लए तैयार नह ं हु ए, ले कन बाद म संबि धय ने
मना लया। ले कन वैवा हक र त- रवाज़ ने उ ह झकझोर कर रख दया और वे अपने
मचय माग पर लौट
आए। ले कन नाई ने उ ह प नी के घर जाने के लए मना लया। वे ससुराल तो गये। ले कन योढ़ से आगे नह ं
गये। उनक प नी ने उ ह मठाई और केले परोसे। नानू ने दो केले खाये और दुर जाकर प नी को संबो धत करके
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कहा- तु हारा और मेरा माग अलग अलग है । तुम अपने माग पर जाकर खुश रहो और मुझे अपने माग पर
चलने दो। इतना कहकर वे वहाँ से चले गए। अ य सं या सय क भाँ त नानू भी जीवन के रह य को जानने के
लए दै हक ब धन को तोडते हु ए मु त संसार क ओर नकल पडे।
5. ी नारायण गु ने मि दर नमाण करने का न चय य कया?
गु जी संत थे। उनक
ि ट से सभी मानव समान थे। उस काल वशेष क
मि दर म वेश केवल उचच जा त को मलता था और उ ह भी अपनी जा त क
था।
था से वे स न नह ं थे।
ेणी के अनुसार ह रहना पडता
येक जा त को अपनी ेणी के आधार पर एक दूसरे के पीछे पूजा थल से नि चत दूर पर खडा होना होता
था। ा मण म भी उ चतम वग के ा मण को ह मि दर म पूजा का अ धकार था। यह था उनके लए
अस य थी और शवरा ी के कुछ दन पहले उ ह ने घोषणा क क म तीक
प म शव लंग क
थापना
क ँ गा। मि दर नमाण के लए कोई यव था नह ं थी। क तु वामीजी ने उसक कोई परवाह नह ं क और
कहा-यह समतल च ान ह आधार पी ठका होगी और म नद म गोता लगाकर च ान का एक टु कडा उठाकर
लाऊँगा, वह शव लंग होगा। ी नारायण गु जी ने ठ क अध रा ी को नद म गोता लगाया और एक प थर का
टु कडा अपने व
थल पर चपकाए नद के बाहर आए और उसे लेकर यानम न अव था म आँख मूँदे तीन
घ टे तक खडे रहे । ात: तीन बजे गु जी ने शव लंग को पी ठका पर था पत कर उसका अ भषेक कया।
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7.द लत आ दोलन और अ यनकाल
-डाँ.श शधरन
मानवा धकार से वं चत अछूत घो षत कए गए, गुलामी और पराधीनता का अनुभव करनेवाले,
जानवर सा जीवन बतानेवाले लोग द लत कहलाए। ज़मी दार और भू वा मय के धा यागार को खून पसीना
एक करके भरने वाले को अछूत घो षत करके अ भजात ने हटा दया। द लत के अ धकार को पुन: था पत
करने क लडाई का नेत ृ व बीसवीं सद के ारं भ म अ यनकाल ने कया।
भागत के अ य ांत क अपे ा केरल म जा त यव था का स त पालन सवा धक होता था। जा त के
आधार पर ा मण सबसे ऊँचे और परया, पुलया आ द जा तय के लोग सबसे नीचे हु ए। परया,पुलया,कुरवा जैसे
अनुसू चत जा त के लोग को ह द लत कहा गया। जानवर को छू सकते थे ले कन एक द लत को छुआ तो
सवण ह दु नान के बाद ह शु हो पाते थे।
केरल के सामािजक बदलाव म ईसाई मशन रय का बहु त बडा हाथ रहा है । चा नार जा त के कई
लोग ने ईसाई धम को वीकार कया। उस ज़माने म
ी चोल पहन नह ं सकती थी। 1828 म दो चा नार औरत
चोल पहनकर चल तो उनक चो लय को कुछ सवण ने चीर डाला। चा नार ने खुलकर इसका वरोध कया।
1859 जुलाई 26 को ावनकोर महाराजा को चा नार औरत के व
पहनने क आज़ाद को मंजूर दे कर ऐलान
करना पडा।
महा मा
ी नारायण गु ई व जा त के लोग के आ याि मक और सामािजक गु एवं नेता थे। सन ्
1888 म उ ह ने त वन तपुरम के अ व पुरम म शव लंग क
त ठा क । उ ह ने अपने समुदा के लोग का
संगठन कायम करने और उनका उ ार करने का सराहनीय काय कया।
आधु नक केरल के इ तहास नमाण म अ यनकाल का मह वपूण थान है । उनक को शश क वजह
से केरल का द लत वग आज क अ छ -खासी सामािजक ि थ त को हा सल कर सका है । द लत के उ ारक
अ यनकाल का ज म सन ् 1863 आग त 28 को केरल के त वन तपुरम के नकट व डा नूर म हु आ था। वे
अ यन और माला के सबसे बडे पु थे। माता- पता ने उनका नाम काल रखा था। ले कन बडा बनने पर पता का
नाम जोडकर वे अ यनकाल के नाम से
स हु ए।
काल के पता अ यन पु तल तु नामक
स
घराने के ज़मी दार परमे वरन प लै के खे तहर,
मज़दूर एवं का तकार थे। परमे वरन प लै ने सवा आठ एकड खेतील ज़मीन अ यन के हसाब म लखवाने क
मदद क । फल व प भू मह न अ यन भू वामी बन गया। जीवन के कटु अनुभव से अ यनकाल ने द लत क
ि थ त म सुधार लाने क ज़ रत को महसूस कया। पहले उ ह ने युवक को संग ठत कया। उ ह लगा पंचम
वण के लोग को आम रा ते से गुज़र पाने लायक सामािजक नयम अ याय है । कानून और याय केवल सवण
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के हाथ म थे। मवे शय क तरह मनु य बेच-े खर दे जाते थे। इसी तरह के भावनाओं ने अ यनकाल को द लत
वारा झेल गई पीडा, परे शा नय से लड़ने क
ेरणा द ।
सन ् 1893 म अ यनकाल ने एक बैलगाडी खर दकर गाडी म सैर क । उन दन बैलगाडी पर सवार
सफ सवण का हक था। राह चलने क आज़ाद के लए हु ई पहल लड़ाई मार-पीट म बदल गई। द लत ब च को
कूल म दा खला होने का अ धकार पाना अ यनकाल का दूसरा ल य था। सन ् 1905 म उ ह ने वे डा नूर म
एक झ पडी बनाकर पाठशाला क
सवण ने उस पर आग लगाई।
थापना क । केरल क द लत जनता का वह पहला सर वती मि दर था।
या मण न करके काल और सा थय ने उसी जगह पर दूसर झ पडी बनाई।
उ नीसवीं शता द के अ त म और बीसवीं शा द के आरं भ म ईसाई धम के चार- सार के लए केरल
म आये मशन रय क वजह से यहाँ के सामािजक, सां कृ तक, सा हि यक और शै
क
े
म कई बदलाव
आए। द लत क तर क के लए भी उ ह ने मह वपूण सेवाएँ क ह। मशन रय ने इन द लत का धमप रवतन
कया। धमात रत द लत ने ह दुओं को नर र, का फर आ द कहकर उपहास कया। यह समुदाय के लए
खतरा है ,जानकर काल ने धमातरण का वरोध करने का न चय कया। उ ह ने
सामने नवेदन
ीमूलम ् त ना
महाराज के
तुत कया और महाराज को घोषणा करना पडा क बलपूवक धमातरण नह ं होना चा हए।
सन ् 1933 को सरकार ने मि दर वेश स म त का गठन कया। स म त के सद य एकमत के समथक
नह ं थे। सन ् 1936 को मज़बूर होकर सरकार को मि दर
वेश का ऐलान करना पडा। इसी बीच गाँधीजी
ावनकोर आए। 1937 को गाँधीजी वे डानूर आए। वहाँ हु ए जलसे म गाँधीजी ने काल को द लत के राजा कहा
था।
सन ् 1905 को सदान द
वामी नामक
े ठ योगी
वे
म आए। उ ह ने ह दु धम म या त
दुराचार का वरोध कया। काल भी वामी क बात से
भा वत हु आ।
सा थय से मलकर अपने
थापना क , िजसका नाम था चत ् सभा। सन ्1907
म न ठ मठ क एक शाखा क
वामी ने अ यनकाल और उनके
फरवर म काल ने चत ् सभा से वदा लेकर साधुजन प रपालन संघम क
द लत को सामािजक, राजनी तक,शै
क
े
थापना क । इस सं था से ह
म पया त तर क मल । काल एकमत से संघ के अ य
चुन
लए गए।
साधुजन प रपालन संघम म द लत ने सबसे पहले अपने ब च को कूल म दा खला पाने के बारे म
सोचा। 1907 से ह द लत के अनुकूल सरकार आदे श आया। सरकार आदे श को अफसर ने धँसा लया। काल
और सा थय ने कूल म जाकर पूछताछ क । काल ने हडताल का आ वान कया। जब तक द लत ब च को
कूल म दा खला नह ं दगे तब तक खेत म काम नह ं करगे। काल ने द वान से मलकर 1910 म कूल म
दा खला होने का आदे श ज़ार कया।
उस ज़माने म द लत ि
य को सोना या चाँद से बने आभूषण पहनने क मनाह थी। वे चकने प थर
से बनी मालाएँ और लौह तार से बनी चू ड़याँ पहनती थी। काल ने इन आभूषण को छोडने का आ वान दया।
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1939 को कु नाडु म म दरा के खलाफ़ उ ह ने अपने समुदाय क जनता को जाग रत कया। सन ् 1941 जून 18
को अ यनकाल नाम के इस महान समाज सेवक क मृ यू हु ई।
Paragraph questions & answers :
1.द लत का जीवन कैसा था?
केरल क द लत जनता को स दय तक मानवा धकार से वं चत होकर जानवर जैसा जीवन बताना
पडा। अछूत घो षत कए गए इस वग ने िजस गुलामी और पराधीनता का अनुभव कया था, ददनाक और
भयानक था। धनी ज़मी दार और भू वा मय के यहाँ गुलाम बनकर जीना इनक नय त थी। इनका जीवन
खेत -ख लहान से संब था। धूप ,बा रश हवा सहकर खून-पसीना एक करके खेत म काम कया। इसी कारण वे
काले रं गवाले बने। इस वग क मेहनत का शोषण िज ह ने कया था, उ ह ने ह इस वग क न दा क , इनको
ता डत कया। द लत को छूना तो दूर, सवण ह दु उनक परछाई तक से अप व हो जाते थे। नान के बाद ह
शु
हो पाते थे। इ ह न सावज नक कुओं से पानी लेने का अ धकार था, न आम रा ते से गुजरने का या
व यालय से श ा पाने का। मि दर के दरवाज़े इनके लए बंद थे।
2.चा नार आ दोलन कैसे हु आ?
केरल के सामािजक बदलाव म ईसाई मशन रय का बहु त बडा हाथ रहा था। जब केरल के द
पर मशन रय का काय शु
णी छोर
हु आ तो वहाँ के कुछ चा नार (नाडार नामक जा त के लोग) ने ईसाई धम को
वीकार कया। ईसाई धम के भाव से इस जा त के औत ने चोल पहनना शु
कया। उस समय चा नार जैसी
न न जा त क औरत चोल नह ं पहनती थी। चोल पहनने क मनाह थी। 1828 म जब दो चा नार औरत चोल
पहनकर चल तो उनक चो लय को कुछ सवण ने चीर डाला। चा नार ने खुलकर इसका वरोध कया। सन ्
1859 म दोबारा इसी तरह क कुछ वारदात हु ई। आ खर 1859 जुलाई को ावनकोर महाराजा को चा नार औरत
के व
पहनने क आज़ाद को मंजूर दे कर ऐलान करना पडा।
3.आम रा ते से गुज़रने क आज़ाद के लए अ यनकाल ने या कया?
1893 म अ यनकाल ने बैलगाडी खर द ल । उस ज़माने म बैलगाडी खर दने और उस पर चढ़कर
सवार करने का अ धकार केवल सवण को ह था। ले कन अ यनकाल ने दो बैल को बाँधकर उस गाडी म सैर
क । गाडी म बैठे काल एक सफ़ेद ब नयान और धोती पहने हु ए थे। सफ़ेद पोशाक पहनने क मनाह थी। कई
सवण युवक ने काल क गाडी को रोका। गाडी म रखे ह थयार लेकर वे गाडी से नीचे उतरे तो युवक भाग गए।
काल ने द लत से मानवा धकार के लए लडने का आ वान कया। द लत म वे धीरे -धीरे आ म व वास जगा
सके। उनको अनुभव हु आ क द लत को, आम रा ते से गुज़रने क आज़ाद कोई भी न दे गा और द लत
वारा
आम रा ते से चलते रहने से ह वह अ धकार मलेगा। इसी बात को लेकर काल ने एक बैठक बुलाई और बैठक
म कई फैसले भी लए। फैसले के मुता बक अ यनकाल और साथी आरालु मूड के बाज़ार म पहू ँच।े
बालरामपुरम के शा लय (जुलाह ) क गल से कई लोग वहाँ पैदल चलने आए। उन सब को रोकने के लए वहाँ
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कई लोग इक ा हो गए। दोन दल के लोग के बीच मुठभेड हु ई। इस तरह राह चलने क आज़ाद के लए हु ई
पहल लडाई मार-पीट म बदल गई।
4. कूल म वेश पाने क माँग के लए अ यनकाल ने या या कया?
द लत ब च को कूल म दा खला होने का अ धकार पाना अ यनकाल का दूसरा ल य था। उस
समय जब सवण का रोब इतना बल था क सरकार कमचार एवं श ा सं थाओं के अ धका रय ने द लत के
त कोई हमदद नह ं दखाई। सन ् 1905 म काल ने व डा नूर म एक झ पडी बनाकर पाठशाला क
क । केरल क द लत जनता का वह पहला सर वती मि दर था। सवण ने उस पर आग लगाई।
थापना
या मण का
यास न करके काल और सा थय ने उसी जगह पर दूसर झ पडी बनाई। नई झ पडी को बनाए रखने का यास
उन लोग ने कया। उस पाठशाला म काल के दो साथी उ ताद बने। बाद म सरकार को कूल म दा खला
संब धी आदे श ज़ार करना पडा।
5.धमातरण के खलाफ़ अ यनकाल ने या कया?
उ नीसवीं शता द के अ त म और बीसवीं शता द के आरं भ म ईसाई धम के चार- सार के लए
केरल म आए मशन रय क वजह से यहाँ के सामािजक, सां कृ तक और शै
मशनर
क
े
म कई बदलाव आए।
वतक जनता के बीच जाकर काम करनेवाले थे। इस लए उ ह द लत के मज़बू रय को दे खने का
मौका मला। गुलाम को भी उ ह ने मा लक से खर दकर मु त कर दया। जा त को नज़र अ दाज़ करके
उ ह ने द लत को अपने व यालय म दा खला दया। द लत जब ईसाई बन जाता तो जा त के नाम पर हु ई
मज़बू रय से वह मु त हो जाता था। मशन रय के काम से धमातरण क
वृि त बढ़ गई। मशन रय के आने
के पहले यहाँ कई ईसाई लोग मौजूद थे। धमात रत द लत के साथ इन ईसाइय का बताव सवण जैसा था। इन
धमात रत को ईसाइय ने अ पृ य ह माना। इधर धमात रत द लत ने ह दुओं को नर र का फ़र कहकर
उपहास कया। वे अपने नकटवत र तेदार से भी दूर रहे ।
अ यनकाल ने अनुभव कया क यह द लत के लए हतकारक नह ं है । उ ह ने दे खा क द लत धम
के नाम पर अलग-अलग हो जाएँगे और यह समुदाय क मज़बूती के लए खतरा है । काल ने
महाराज के सामने नवेदन
तुत कया। महाराज ने घोषणा क
ीमूलम त ना
क आगे बलपूवक धमातरण नह ं होना
चा हए।
6.साधुजन प रपालन संघम क
थापना य हु ई?
अ यनकाल ने महसूस कया कसारे द लत के सि म लत को शश से ह अपन को अ धकार
एवं तर क मलेगी। काल ने सन ् 1907 फ़रवर म साधुजन प रपालन संघम क
थापना के पहले उ ह ने
थापना क । इस सं था क
ी नारायण गु , सी.वी.कंु जुरामन, डाँ.प पु, महाक व कुमारनाशान, जज गो व द
आ द से सलाह मश वरा कया। उन सबसे उनको आशीष मला। इस सं था से ह द लत को सामािजक,
राजनै तक, शै
क
े
म पया त तर क मल । द लत क मुि त के लए काल ने अपना जीवन ह सम पत
कया। काल एकमत से संघ के अ य
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चुन लए गए
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Module -4
शबर ( ख ड का य) – ी नरे श मे ता।
लेखक प रचयआधु नक ह द सा ह य के
यात क व एवं कलाकार
ी नरे श मे ता का ज म म य
दे श के
मालवा के अंचल शाजापुर म सन ् 1924 के दनांक 15 फरवर म एक ा मण प रवार म हु आ। उनका असल
नाम पूणशंकर मे ता है । नरे श मे ता तो उपनाम है । बचपन म ह माँ-बाप क छाया से वं चत नरे श मे ता का
जीवन क ट-क टक से ह गुज़रा है । बचपन से ह वे अ तमुखी रहे ।
नरे श मे ता ने हाई कूल श ा नर संहगढ़ से ा त क , और उ जैन से इ टर क पर
काशी व व व यालय से बी. ए.,एम.ए आ द पर
सैकड लेि चनट का
ाएँ पास क ।
फर के
य
ा पास क ।
श ण सं थान,दे हरादून से
श ण ा त कया। फर पी.एच.डी. भी ा त कर ल ।
सामािजकता ,राजनै तकता, धा मकता और रा
यता आ द के
त नरे श मे ता का अपना वचार है।
नरे श मे ता आधु नक ह द सा ह य जगत म एक नभ क, नडर यि त व के क व है । नरे श मे ता समाज के
अ ध व वास, अ याय, अधम व अस य का जोरदार खंडन करते ह। वे वनयशील तथा ईमानदार क व भी है ।
नरे श मे ता क क वताओं म गाँधीजी के वचार का
भाव, छायावाद का भाव, व भ न सा ह यकार का
भाव आ द दे खने को मलते ह।
तुत ख डका य शबर नरे श मे ता से 1975 म रचा गया है ।
इसक कथा वा मी क रामायण पर आधा रत है । शबर क कथा के मा यम से क व ने एक वलंत
सम या को उठाया है , जो ाचीन से लेकर आज भी वैसे के तैसे दखाई दे ती है । इस ाचीन सम या का समाधान
क व ने नवीन संदभ म खोजा है । शबर म एक आशावाद
वर मुख रत है ।
तुत ख डका य के वारा क व
यह दखाना चाहते ह क न ठावान यि त सदा सफल होता है । य द उसम वच व है तो वह अपनी प रवेशगत
या युग के हर सार सम याओं या ग यवरोध के बावजूद , वयं को ऊपर उठा सकता है और वरे य बन सकता
है । शबर इसका उदाहरण है ।
शबर ख डका य का सारांशशबर क कथा उस समय क कथा है िजस समय सतयुग का सारा समाज त
े ायुग म बदल गया था।
अर य क
ाम-स यता नगर स यता म बदल गयी थी। समाज म जन पद जैसी सं थाओं का ज म हो गया
था। उतर भाग म आय क बि तयाँ नाग रक स यता से फैल रह थीं और द
णी ाय वीप म
वड तथा
वं याचल म कोल- करात एवं अ य व य जा तयाँ फैल गयी थीं। समाज म वण- यव था घर कर रह थी।
ा मण
प
ान-तप या करते थे।
य समाज के र क और पालक थे। कुछ व य जा तयाँ भी थीं। वे पशु-
य का शकार कर अपना जीवन-यापन कर रह थीं। इ ह ं लोग से मलती-जुलती एक शबर जा त थी, जो
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ाम या नागर य समाज से दूर वं याचल के वन म रहती थी। नरे श मेहता ने शबर का जीवन ऐसा ह
तुत
कया है । ले कन शबर व य जा त क होते हु ए भी पशु- हंसा से दूर है । इसी लए वह घर प रवार को यागकर
पंपासर के मतंग ऋ ष के आ म म पहू ँचती है । वहाँ आ म वासी उसका वरोध करते ह। य क वह न न वग
क है । इतना ह नह ं जब ऋ ष उसे आ म म
थान दे ते ह तो वे अछूत नार के आ म
आपि तजनक मानते ह। इस स दभ म क व ने जो कुछ कहा है वह आज के युग को भी प रल
वेश को घोर
त करता ह।
आचार कसी का जग म
वैयि तक कब हो सकता है ?
है अ य ि
याँ-क या
िजन पर भाव पड़ सकता।
आ मवा सय के इस आ ेप से मतंग ऋ ष को बड़ा दुख होता है । वे सोचते ह, या
जीवन क साि वकता- तप या उ च वग के लोग के लए ह है। वैरा य प शबर
बल समाज क
ताड़ना, लांछना,
त हंसा,
ानयोग तथा भि तयोग के
तशोध और एकां तक जीवन क कठोरता को सहज ह पारकर
लेती है और अ त म उस शांत , त ल ना अ य व शबर को परम प राम वयं आकर स मा नत करते ह।
हर युग म अ छे काय के माग म न य काँटे बछाये जाते ह। अ तत: शबर क न ठा, उसक तप या, उसके
न न व य क उ च वण म बदल दे ती है ।
थम सग- त
े ाशबर क कथा त
े ा युग क एक अ य त साधारण नार क कथा है । वह शबर जा त क
ी थी और
उसका नाम था मणा। क व ने पहले त
े ा युग का वणन कया है ।
सतयुग म त
े ा म बदलने से सार ि थ तयाँ बदल गई। वन को काट लोग ने ख लहान बना लये।
सड़क का नव नमाण हो गया। नए नगर और क बे बस गए। रा य और जनपद समाज म पनपने लगे। नगर
और स यता को लेकर आय बि तयाँ ज म ले रह थीं। सभी का वण यव था के आधार पर वभािजत कया
गया था। धम और नै तकता क नींव जन मानस म पड़ चुक थी।
े ठ माने जाते थे।
ा मण
य र क और पालक थे। वै य को यापार से तथा शू
का संब ध जोडना था। या शू
ान और तप या के कारण सब से
को म यव था से ह यि त
के घर ज मा मनु य ा मण के से कम नह ं कर सकता? जो स ांत को न
मानकर ऋ ष कम म व न डालते थे, उ ह रा स कहा जाता था। इनका जीवन दशन तो केवल
हंसा,लूटपाट,ह या, आ द था। रे वा से लेकर कावेर तक ये लोग बसे हु ए थे। मुन यता से दूर, वयं म म त
वं य वन म शबर जा त बसती थी।उस शबर जा त म ज मे शबर का प रचय दे ते हु ए क व कहते ह क शबर
हंसक कुल म जीती थी पर मूलत:
हंसा से उसे घृणा थी। शबर प रवारवाल के साथ रहना पस द नह ं करती
थी य क अपना घर उसे बूचड़ खाना लगता था और प रवार के लोग ह यारे । वह सोचती थी क या यह पाप
कम ह मेरे जीवन म लखा हु आ है । वह भु के बनाये वन,नद ,धरती को दे खती क भु ने कतनी मधुरता से
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इ ह बनाया है । ले कन मनु य कतना पापी है लूटपाट, ह या आ द के अ त र त उसे कोई और काम ह नह ं।
वह सोचती है क या म अपने प रवार के बीच म रहकर अपना आ मो ार कर सकती हू ँ। वह सोचती है क या
इसी नरक म उसका सारा जीवन बीत जाएगा।ऐसे ह
न से वह दन रात घर रहती ।
एक दन शबर के मन म इस प रवार मोह के
त वतृ णा भर गई और सोचने लगी क अगर कोई
ब धन रखना है तो य न उस भु का ब धन रखा जाए। कुल-कुटु ब क चंता से तो भु क आराधना कह ं
े ठ है । अगर अपने जीवन को साथक करना है तो इस प रवार का मोह यागो। शबर के मन मानस का यह
वं व अपनी चरम सीमा पर पहू ँचकर उसे यह नणय दे ती है । अपने इस नणय को काय प दे ने के लए वह
घर-प रवार को याग, ब च को सोते हु ए छोड, भ क आराधना म चल पड़ती है ।
वतीय सग- पंपासरएक रात शबर अपने प त तथा ब च को सोये छोड प पासर चल आई। उसने प पासर के बारे म सुन
रखा था क वहाँ बडे-बडे ऋ षयाँ अ यंत तेज वी ह,िजनके ओज वी वाणी को सुनने दूर-दूर से लोग आते ह।
प पासर म पहू ँचते ह उसे लगा क न न जा त के होने के कारण वह ऋ ष-दशन कैसे करे गी, कैसे आ म म
आयेगी। ात:काल था, सभी नान यान म लगे हु ए थे,
वहाँ का
येक आ मवासी अपने-अपने काम म लगे हु ए।
य मनोरम था । कह ं हरण झूम रहे थे तो कह ं आम क डाल पर तोते बोल रहे थे। ऋ ष
क याएँ पोखर से जल ला रह थीं, य
वे दयाँ सुलग चुक थीं और वेद पाठ आरं भ हो गया था। वहाँ के सारे
वातावरण म शबर को शां त का आभास हो रहा था। सभी थान हरे -भरे थे,दूर कह ं एकांत म मयूर अपने
क रासल ला दे ख रह थी।
इन सभी मनोरम
य
येक कार के रं ग- बरं गे फूल वहाँ खले हु ए थे, भौरे कमल रस का पान कर रहे थे।
य को दे खती हु ई शबर मतंग ऋ ष के आ म के पास पहू ँच गई। वहाँ य
क पावन द य
गंध वायु म समा हत थी।
मतंग ऋ ष के आ म के पास ह पोखर म शबर ने सबसे पहले नान कया। फर वह ऋ ष के आ म
के फाटक पर दशन के लए बैठ गई। पाठ ख म होने पर ऋ ष जब मंडप से उठकर आए तो फाटक पर एक
ी
को दे खकर सकुचा गए। ऋ ष के सामने आते ह शबर ने उनके चरण को णाम कया। ऋ ष के पूछने पर क
वह कौन है , उसका मन संशय
त हो जाता है । वह मन ह मन सोचती है - य द मने उ ह बता दया क म
अं यज हू ँ तो या ऋ ष मुझे आ म म रख लगे, अगर ऋ ष रख भी लगे तो बाक तपोवन वासी उनका जीवन
दूभर कर दगे। एक तो अं यज, दूसर शबर जा त क और उस पर
ी, यह सब उसके नणय को डगमगाते नज़र
आते ह। वह हंसक कृ त को छोड़ अ या म पपासा के लए ऋ ष मतंग से कहती है—आप के दशन से मेरा
जीवन ध य हो गया। म शबर जा त क हू ँ और आप के चरण क सेवा आज से मेरा इ ट है । मतंग इस पर
आपि त करते ह और कहते ह क तु हारा घर प रवार होगा, संब धी ह गे। शबर कहती है क म उन सबका मोह
याग आई हू ँ। मुझे अपने अं यज होने क सीमा का
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ान है । म तो आप के चरण म ह पड़ी रहू ँगी।
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ऋ ष लोकापवाद से डरते ह और उसके वहाँ रहने का नणय अ य को स प दे ते ह। साथ ह यह भी
कहते ह क अगर तुम उ च वग क होती तो यहाँ कोई
न ह पैदा न होता।
शबर का यि त व यहाँ अ यंत नखर कर आया है। जब वह कहती है क भु तो सार सांसा रकता
से
े ठ ह, अि न प ह िजनक प व ता को छूकर अं यज भी प व
हो जाते ह।
या उ च वग को ह
आ मो नयन का अ धकार है ? भु तो सब के लए समान ह। फर उनक आराधना को सीमाओं म य बाँधा है ?
शबर के इन श द को सुन ऋ ष उसके मन म जो भि त क भावना है और आ मो नयन क भावना है , से तथा
उसके आ याि मक व व को समझ जाते ह। शबर अपने यि त व से ऋ ष को भा वत करती है और कहती
है क वह केवल भु के चरण क सेवा करना चाहती है । उसके लए जीवन-यापन क कोई सम या नह ं। वह
गाय क सेवा म संतु ट है । भु के
ीमुख से वचन सुनकर वह भव-सागर से पार हो जाएगी। अगर गु क
कृ पा हो जाये तो यह पा पन ह रगुण गाकर , भु क आराधना कर इस संसार पी भव-सागर से तर सकती है ।
मतंग ऋ ष उसके यि त व से अ यंत भा वत हो जाते ह और उसे न चय दलाते ह क वह अव य
ह भ त म
े ठ होगी। उसम तो वयं भु बोल रहे ह। ऋ ष उसे अपने आ म म गाय को संभालने का तथा
आ म क सफाई का काय स प दे ते ह। शबर ऋ ष क कृ पा से अ यंत भाव व वल हो जाती है , उसक आँख म
आँसू आ जाते ह। वह ऋ ष के चरण म
णाम करती है । ऋ ष मतंग उसे आ म के भीतर लाते ह। सभी
आ मवासी है रान होतो ह। शबर गोशाला म जाती है । उनक आँख को दे ख उसे लगता है क मानो वे मौन
नमं ण उसे दे रह ह । वह एक-एक के पास जाती है । कसी को सहलाती है , कसी का सर सूँघती है , कसी को
आ लंगन म लेकर यार करती है । मतंग उसक यह ल ला छपकर दे खते ह—और सोचते ह न जाने यह अब तक
कहाँ बह रह थी। उ ह व वास हो जाता है क यह न चय ह पु या मा है । न जाने कौन से कम से यह भटक
गई थी। वे सोचते ह क आ मवासी संदेह तो अव य करगे ले कन अगर यह भु क ल ला है क उ ह ने इसे यहाँ
भेजा है तो वे मेरा माग दशन भी करगे।
तृतीय सग: तप या:
का य के तृतीय ख ड म शबर का तपि वनी
प दखाया गया है । तपोवन से दूर प पासर के एक
कोने म वह कु टया बनाकर रहने लगती है। वह अपने इस प रवतन से वयं वि मत होती है , उसे अतीत क
मृ त हो आती है क कैसे बचपन म उसक स खयाँघ सल से क चे अ डे खा जाती थी तो उसे कतना
अमानवीय लगता था। कटते पशुओं का कँपकँपाना उसे व न म भी दखाई दे ता था। वह सोचती रहती थी क
मानव कतना नदयी है । संसार म सब कुछ असु दर तो नह ं। भगवान ने स रता, तारे ,सूय, झरने, फूल आ द
कतने सु दर बनाये ह। ये घास कसने बनायी है िजसको पशु चरते ह। गु क आ ा के अनुसार उसने वयं पर
अंकुश रखना सीखा। ा म मुहूत म उठना, नान यान करना, कुश तथा फूल को चुनकर लाना, सूय दय से
पहले गौशाला म गायो को दाना-पानी दे ना, दूध दुहना, गोबर से न य आंगन ल पना, तोता मैना से बात करना,
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येक या ी क आव यकता को पूरा करना, न य आ म क सफाई तथा आते समय वचन सुनना, उसने
अपना न य कम बना लया था।
सं या होते ह अपनी कु टया वा पस आ जाती। उसे
त ण ऐसा लगता जैसे कोई उसके साथ है । वह
बेसुध हो जाती थी। इतनी त मय हो जाती थी। शबर सभी कम को भु का
ग
ंृ ार समझकर स पा दत करती
थी। वह कृ त म भु का आन द लेने लगी थी। अब शबर श या से भ त बन रह है िजसने अपना सव व भु
को अपण कर दया है । यह जब तेजस यो तपुंज म प रवतन होगी तो भु तीन लोक को छोड़ उसे दशन दे ने
आयगे।
चतुथ सग: पर
ा:
शबर के चतुथ सग म शबर के यि त व, धम और भि त-भाव क पर
ा है । तपोवन म केवल
मतंग ऋ ष ह शबर के महाभाव को समझते थे क अब वह संपूणता म भु म ल न हो रह थी। मतंग अपने
वचन म उसका उ लेख करने लगे थे।
तथा दु:ख दे ना लोग को
येक युग म ऐसे लोग क पर
ा होती रह है । अपमान,बदनामी, पीड़ा
य लगता है फर शबर को ये लोग य छोड़गे। मु न-साधु होने पर भी ये वेष भाव
को याग नह ं सकते। सभी आ मवासी ऋ ष के
त शबर को लेकर संदेह य त करते ह और एक अछूत नार
के आ मवास पर आपि त करते ह। यहाँ क व ने उ च वग का न न वग के
त यवहार दशाया है । मतंग ऋ ष
को लेकर बहु त ह लोकापवाद फैलता है । अ य तपोवनवासी ऋ ष को बुरा-भला कहते ह। मा
पर वण को मह व दया गया है । धम सामािजकता के ऊपर नह ं है । इस लए शू
अ धकार नह ं है । प पासर चाहे सावज नक है ले कन शू
को य
भु कम के थान
और पूजा करने का
के लए विजत दे श है । शबर को ऋ ष ने कसक
आ ा से रखा है । ऋ ष शायद आ म क मयादा भूल गये है । यह घोर अनाचार है क उ ह ने एक शू को घर म
थान दया है , मतंग क तो बु
ट हो गई है । अपने कथा और वचन म न य शबर का संग तथा उसे
सा व ी और अनसूया के साथ गनना इससे बड़ा और पाप इस संसार म और या हो सकता है ।
सभी तपोवन वासी एक होकर शबर और मतंग के संग को लेकर उ तेिजत है । वे इसका भाव
अ यआ मक ि
य और क याओं पर मानते ह क अगर ऐसा आधार रहेगा तो इन पर बुरा भाव पड़ेगा।
उ ह समाज का नणय वीकार नह ं तो उ ह ब ह कृ त करना ह होगा। यहाँ क व प ट कहना चाहता है- समाज
म गल –सड़ी परं पराओं और
ढ़य को तोडने वाल
ानी पु ष को भी समाज अनेक बार ब ह कृ त कर दे ता है ।
समाज का नणय सुनकर ऋ ष मन ह मन ख न होते ह। वे सोचते ह क इस साधु-समाज म कब धम का मम
जागृत होगा। अपने को े ठ समझना कतना म है । या धम त व से वणा म मयादा ऊँची है ? जब तक शबर
साधारण जन थी वह तबतक शू ा थी, ले कन अब वह शि त है , दे वी है । अब वह ज म-मरण से मु त वैरा य प
है । ऋ ष शबर का मह व बतलाते हु ए कहते ह क य द प पासर है और रहेगा तो केवल शबर के कारण। वे
समाज के बारे म कहते ह—समाज तो
येक युग म अ छे मनु य के माग का काँटा बना है । यहाँ क व धम त व
को मयादा से ऊँचा माना है ।
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ऋ ष मतंग ने समाज के नणय को ठु करा कर तपोवन से दूर जलाशय के नकट कु टया बनाई जहाँ
रहकर शबर को योग भि त,
ान और दशन सखलाया। ले कन अभी उसक पर
ा शेष थी। वह थी उसके
प व जीवन क । उसके एकां तक जीवन पर समाज ने घोर लांछन लगाए। शबर के दन
त दन तेज प को
सुनकर मु न वेष-भाव से जल रहे थे। उ ह ने उसे वहाँ से नकालने का उपाय सोचा। वे उसके प रवार से जाकर
मले तथा उसे वहाँ से उठाने क योजना बनाई। समाचार को सुनते ह शबर का प त कुछ सा थय को लेकर वहाँ
आता है । वह अ य त
ो धत है क उसने हमार शबर जा त क नाक काट द है। तपोवन वासी उसे समझाते ह
क आधी रात के समय उसके घर जाना तब वह कु टया म अकेल रहे गी। ले कन मुँह को बाँधकर अँधेरे म ले
जाना। आज अमावास का दन है और तु हार इ ट दे वी का दन है । तु हारे लए कतना मंगलमय है क बात से
वे खोई हु ई
ी ा त होगी। ऐसी बात से वे शबर के प त को बहका कर उ तेिजत करते ह।
रात के समय वह अपने सा थय के साथ शबर के कु टया के पास जाते ह वहाँ वे पेड़ के पीछे छपकर
बैठ जाते ह। आधी रात के संकेत को समझकर वे कु टया क ओर बढ़ने लगे। उ ह अ धकार म खड़क से काश
छनकता कु टया दखाई दया। सभी उस खड़क के पास जाते ह। वहाँ जाने पर दे खते ह क संहासन क
के आगे द पक जल रहा है और शबर
तमा
भु आराधना म ल न है । पावनता क उस मू त को दे खकर शबर आ चय
च कत रह गये। कु टया म से चंदन क महक आ रह थी। उ ह कु टया के अ दर कसी जादू-पु ष का आभास
होता है । दरवाज़ा खोलकर जैसे ह वे अ दर पहू ँचे , वे डर से काँपने लगे। शबर
भु म ल न थी और द पक जल
रहा था। शबर दल सोच रहा था क उसे पकडने से अगर वह च लाई और ऋ ष के कान म वर पड़ा तो हम सब
मुसीबत म पड़ जायगे । उ ह ने योजना बनाई क सभी एक साथ दबोच लगे और उसका मुँह बाँधकर शी ह ले
जायगे। य ह वे शबर के नकट गए, वहाँ शबर के चार ओर आग का कु ड दखाई दया। धीरे –धीरे आग का
कु ड उ ह सुलझाने लगा और वे च लाने लगे।
कुछ
ण बाद आहट हु ई। ऋ ष मतंग के आते ह कुट म जादू सा समा त हो गया। ऋ ष ने उनके आने
का कारण पूछा। शबर दल काँप उठे और
मा याचना के लए ऋ ष के पैर म गर पड़े। ऋ ष ने उ ह
मा कर
दया और ात:काल से पहले ह वे वापस लौट गए। शबर को इस प रि थ त का बलकुल भान नह ं हु आ। वह तो
भु आराधना म ल न थी। ऋ ष उसक कु टया का वार बंद कर अपने आ म म लौट आए। सूय दय होते ह
शबर चैत यमय होकर बाहर नकल । वहाँ जो कुछ हु आ इसके बारे म शबर को कुछ पता भी नह ं था।
पंचम सग: दशन:
अं तम सग दशन म भु शबर को दशन दे ते ह। शबर और मतंग को लेकर जनमत अभी भी उ
प
धारण कये हु ए था। उस समय सीताहरण क कथा सभी जान चुके थे,ले कन सभी ववश थे कोई या कर सकता
था? जो य
का र क हो, उसी क नार का हरण हो गया और वह आय का र क वन-वन म घूम रहा है । थोडा
संतोष था क उनके साथ ल मण है । मतंग तो
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लोकदश थे। वे भगवान क इस माया को जानते थे क भु
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मानव
प धारण कर धरती को साथक बनाने आए ह। भु का वन म आगमन सुन वे नि चंत हो गए। उ ह
व वास था क अब शबर
भु के दशन पायेगी।
सं या वंदन कर ऋ ष अपने आ म से बाहर आये तो उ ह ने कुछ लोग को दूर से आते दे खा। शबर
महाभाव से अपनी कु टया म बैठ थी। उसे संसार का इस समय
ान नह ं था। भीड़ के नकट जाते ह दो दे व
पु ष ऋ ष के चरण म झुक गए। ऋ ष ने मन ह मन कहा क यह तो राम और ल मण क जोड़ी है । मतंग ऋ ष
उन सबको लेकर आदर स हत आ म म आए। सभी चुप चाप अपने आसन पर बैठे थे। कुशल
ेम के बाद ऋ ष
ने उनके आने का योजन पूछा। प पासर के नवासी चु पी साधे हु ए थे। उनक चु पी तोडते हु ए राम अ य त
वन
वर म बोले- इस शांत तपोवन म आकर मेरा जीवन साथक हो गया है । प पासर म आपका सूना आ म
दे ख मेरे मन म बहु त क ट हु आ। तब ऋ ष का मह व बतलाते हु ए राम ने कहा है क इन अ
वाद फैल रखा है ? चौदह सम त भुवन म भी मतंग जैसा ऋ ष नह ं है। जो
जन ने यह कैसा
ान और भि त का साधक हो,
ऋ षय का आराधक हो, वह मयादा या नयम का बाधक नह ं हो सकता। वह तो सा ात ् धम
प है िजनक
तप याग न को छूकर सभी वण हो जाते ह। मने शबर क तप गाथा सुनी है । स पूण मानवता उसक गाथा
सुनकर सुगि धत होगी। शबर अं यज है तो या हु आ? वह भि त का प है , शव शि त का प है ।
उसी समय वेत व
म शबर पहू ँचती है मानो कोई अकलंक तप या हो। उसके नयन क णा से भरे
थे। उसम दन का तेज था। रा ी क नीरवता थी। मानो उपवन और आ म के फूल उसी से सुगि धत थे। वह ऐसी
पावन थी मानो प व ता उसी से है । वह उस भीड को चीरती हु ई ऋ ष के स मुख पहू ँच जो पूजा- साद लाई थी,
वह उसने गु के सम
रख दया। साद के प म वे केवल जंगल बेर थे। राम को याम वण म दे ख उसे लगा
तो मानो पृ वी पर भु ने प धारण कया है । उसे पता चल गया क ये ह राम ल मण ह जो उसे दशन दे कर
कृ ताथ करने आए ह। उसने प पसर वा सय क ओर कोई यान नह ं दया। वह गीत गाती हु ई भु म त ल न
हो गई। उसका सारा तन-मन पुि पत हो रहा था। उसके भीतर आन द खल रहा था। यह सं या उसे वराट लग
रह थी। वह आन द के आँसुओं म डू ब रह थी। यह भगवान क ऐसी महाकृ पा है जो इस दुगम अर य वन म भु
शू ा शबर के घर आए है । उसक संपूण इि
याँ आँख म खींच आई थी। आज तो सागर वयं नद के वार पर
चल कर आया था। यह आकां ा कब से थी क नद को सागर कभी पुकारे । यह कृ त के नयम व
आज
पहल बार हु आ, वरना नद ह समु म आकर मलती है । भु के आगमन पर वह इतना त ल न हो गई क उसे
कुछ नह ं सूझ रहा क वह उ ह कैसे बठाए? कन मं
से उनका आवाहन करे ? और कौन-सा गीत गाए। या
भु केवल फूल क माला वीकार कर लगे, कैसेवह उनके चरण को धोये, उ ह पंखा झुलाएँ?
नाम से पुकार, उ ह या संबोधन दे । ऐसे ह
न म घर वह भु से कहती है क म तु हारे ह भरोसे हू ँ भु।
मुझे मुि त दो। इस कुल कलं कनी शू ा को तुम बड़भागी बना दो। वह भु के चरण म
झुक हु ई थी। उसके आँख से
भु के चरण भीग गये थे।
बठाया। भु ने पूजा- साद के न म त बेर क
भु को वह कस
ा और वनय भाव से
भु राम ने उसे उठाकर आदर स हत आसन पर
शंसा क । शबर मन ह मन सोच रह थी क बेर भी सभी मीठे
नह ं ह गे। उनके मन म अ यंत संकोच था क भु को खाने के लए या द।
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वह अपनी शंका को मन म दबाये हु ए थीले कन भगवान तो भाव के भूखे ह। भु को उ सुक दे ख शबर
के आँसू सूख गए। वह भु को वयं पहले चखकर बेर दे गी जो बेर मीठे ह गे। वह सहज-भाव से भु को चखकर
मीठे रसाल दे ने लगी और भु सहज-भाव से खाने लगे। ल मण राम के इस यवहार से है रान थे और सोच रहे थे
क
भु को कोई आगर ज़हर भी दे दे तो बना कसी झझक के पी लगे। तब भु ने प पासर वा सय को
संबो धत करते हु ए कहा है क –म आज पावन हो गया हू ँ।
शबर जग जननी है । मुझे तो पहले ह इस परम सती क कथा मालूम थी। िजसपर इस सती क कृ पा
हो जाय , उसे ज म-मरण के इस च
से मुि त मल सकती है । शबर को तपि वय म शरोम ण घो षत करते
हु ए कहते ह क त
े ा युग म शबर से ऊपर कोई े ठ भ त नह ं। य ा द सब शबर से स है । म सती का यह
वागत स कार पाकर आज कृ त
हो गया हू ँ। भु के यह वचन सुनकर शबर अ यंत भाव व वल हो भु से
बोल क अब म एक ण भी वयोग सहन नह ं कर सकती। शबर के मुख पर उस समय एक द य तेज था।
इसके साथ ह वह वग लोक को चल जाती है । उस
ण सब उस परम सती क जय-जयकार करने लगी। मतंग
ऋ ष अ वचल खड़े रहे । उनके मन म अ य त संतोष था। आज वह शू ा से शि त बन गई थी।
चर
च णशबर -
राम कथा म युगीन वर क
के मा यम से राम कथा क आज क
ि ट से शबर एक मह वपूण कथापा है । नरे श मे ता ने शबर
ासं गकता क ओर इशारा कया है। शबर मतंग ऋ ष क श या है जो
आ म म राम-ल मण के आने पर उनका भि तभावपूण वागत एवं आ त य करती है । नरे श मे ता ने शबर
क ज मगत न न वग यता को कम- ि ट के वारा वैचा रक ऊ वता म प रणत करने का संग
है । भि तन यि त व क अपे ा शबर का आि मक संघष ह उसके च र
तुत कया
को आज के संदभ म अ धक
ासं गक बनाता है ।
शबर जब र त से भीगे ह थयार नद म साफ़ करती है तो धरती क सु दरता को दे खकर कहती है क
भगवान ने कतनी मधुर और सु दर चीज़ बनायी है , पर तु मनु य कतना पापी है जो यह नह ं जानता क
ह थयार का योग कर जीव हंसा करने से या मलेगा। शबर अपने पूव पु य के फल व प सोचती है कौन ज म का पु य जगा
मण शबर के मन म
पाप कम ह लखा चुका है
या मेरे जीवन म।
वह सोचती है क
या मेरा सारा जीवन इसी नरक म रहना पडेगा। इसी तरह के वचार के
प रणाम व प शबर म भगवान क भि त के
त व वास जागता है-
सब ब धन से े ठ कह ं है
....................................
अ छा है भु आराधन।
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समाज,वग,वण तथा प रवेश क जडता से मुि त क
या िजस
म- वधान के वारा च रताथ हो
सकती है , शबर के च र म वह सामािजक योजन मूत हु आ है । शबर क अपनी वग-चेतना के साथ यह आ म
चेतना भी खर है । शबर मतंग ऋ ष क शि तय का बडा साथक समाधान
तुत करती है-
म समझी भु है अि न प ऊपर।
.................................................
िजनक प व ता को छूकर।
आधु नक ि ट को आ दो लत करनेवाल शबर के च र क मूल वशेषता है , उसका मानव- ेम।
शबर क भि त अ य त यापक है जो मानव और कृ त म भु के दशन करती है उन नयन म क णा थी
और थी प व पावनता,
उसको सब भुमय लगता
थी उसम भु क
शबर को वण व वे षय
वैचा रकता का
व प और भी
भुता।
वारा मान सक तथा शार रक यातनाएँ सहनी पड़ती ह क तु इससे उसक
खर हो जाता है । और इसी बीच
भु राम का आ म म आगमन उसक
वैचा रकता और तप –गाथा पर ामा णकता क छाप अं कत कर दे ता है ।
क व शबर के जूठे बेर चखने के संग म उसक बु
मीठे -कड़वे दोन
कार के होते ह। अत: शबर
-संगत या या
तुत करता है । जंगल बेर
वभावत: चख-चखकर मीठे बेर भु को अ पत करती है , िजससे
क भु को कड़वे बेर खलाकर आ त य को लां छत न होने दे ।
आज के अछूतो ार आ दोलन के प र े य म शबर का च र अपने पारं प रक व प के बावजूद एक
नयी अथव ता दान करता है ।
मतंग ऋ ष
च के मतंग , वह समझ गये
क चड म कमल खला है यह
होगी अछूत, पर जाने कन
ज म का पु य खला है यह।
तुत पंि तय से मतंग ऋ ष क
खर ि ट का प रचय मलता है । वे मानवीय नेह क मू त ह।
शबर क द न वाणी सुनकर और उसके भ त- प को इस कृ पा पर आपि त करते ह।
मतंग ऋ ष आ मवा सय का यह ख दे खकर ख नाव था म सोचते ह---
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कब धम-कम जागेगा
साधु-समाज के मन म
अपने को े ठ समझना
द भ नह ं तो या है?
मतंग ऋ ष
काल दश ह।उ ह
ात ह क एक दन भु राम का आगमन आ म म होगा और वे इस
शू नार का उ ार करगे। वे यह भी जानते ह क भगवान धरती को साथक करने आ गये ह। शबर
भु क कृ पा
शरण म जायेगी। और यह हु आ। जब आ म म राम का आगमन हु आ तो वे कहते हम या वाद यह कैसा
फैलाया अ
जन ने ,
है या मतंग के जैसा
चौदह सम त भुवन म।।
इस कार
तुत का य म मतंग ऋ ष म ववेक ि ट,मानवीय नेह, याग और न ठा का उदा त
व प दखाई दे ता है ।
स संग या या क िजए-( Annotations)
1. सब ब धन से कह ं े ठ है
उस भु का ह ब धन
कुल-कुटु ब क च ता से
अ छा है भु आराधन।
शबर नामक ख डका य ी नरे श मे ता से लखा हु आ है । इसम
उ ह ने शबर जा त क एक नार क आ याि मक उ न त क कथा का मा मक वणन कया है । उ ह ने
इस खणडका य के मा यम से यह दखा दया है क अगर इ छा शि त और आ म समपण है तो कोई भी
यि त ,चाहे वह अं यज हो या नार ऊँचे से ऊँचे पद तक पहू ँच सकता है । वह हर तरह क बाधाओं को आसानी
से पार कर सकता है ।
तुत भाग शबर नामक ख डका य के थम सग का है । क व इसम त
े ायुग का प रचय दे ते हु ए वहाँ
के सामािजक स यता के बारे म बताते है । साथ ह व
याचल के वनांतर म जी वत रहे शबर जा त का भी
प रचय दे ते ह। शबर जा त का जीवन-दशन तो हंसा,लूटपाट और ह या आ द ह। ले कन उस जा त म भी ऐसी
एक नार थी िजसको बलकुल अपने कुल और कम से घृणा था। उसे अपने घर म जीना दु कर सा लगा था। वह
सोचती थी क सब पा रवा रक ब धन से
े ठ ब धन है , भु का ेम ब धन। कुल या कुटु ब क च ता से
कतना अ छा है , भु क आराधना करना। क व कहना चाहते ह क न न जा त म ज म होने पर भी पूव ज म
के पु य के कारण शबर ( मणा) के मन म अ या म भाव और भि त जाग पड़ी।
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या आ मा क उ न त केवल
1.
है उ च वग तक ह सी मत?
भु तो ह सबके पता, भला
उनका आराधन य सी मत?
( 1st paragraph is common to all annotations)
तुत भाग शबर ख डका य के दुसरे सग का है । यहाँ शबर के मा यम से क व समाज के जा तपाँ त तथा उ च-नीच भाव के
त अपना म त य य त करता है । शबर अ यज होने पर भी उसके मन म
आ याि मकता और भु भि त जागृत होती है । अपने कुल के
या-कम के
त घृणा करनेवाल शबर एक
दन अपने प त और ब च को यागकर प पासर के मतंगा म म पहू ँचती है । वह मतंग ऋ ष से अपना प रचय
दे ते हु ए कहती है क वह अ यजा है , ले कन आ याि मक उ न त चाहती है। वह आगे कहती है क भु-सेवा ह
उसका इ ट काय है । तब मतंग ऋ ष उससे कहते ह क आ म म शबर को शरण दे ने के लए सब क स म त तो
अ नवाय है । अगर तुम उ चवग क हो तो कोई सवाल ह नह ं उठे गा। यह सुनकर शबर मतंग से पूछती है- या
आ मा क उ न त केवल उ च वग तक ह सी मत है । भु तो सबके पता है । फर य , कैसे उनका आराधन
सी मत हो जाता है ।
यहाँ शबर समाज म दखाई पड़नेवाल जातीयता या छुआ-छूत के
त अपना वरोध कट करती है ।
वह खुलकर कहती है क भु के आगे सब समान है। और वहाँ वण-वग नह ं बि क मन क प व ता या भि त ह
मु य है । ऐसी शबर को पु या मा समझकर मतंग ऋ ष अपनी श या बनाते ह।
एक एक श द म उ तर ल खए
1.शबर कसक रचना है
उ तर- ी नरे श मे ता।
2.शबर पहले कस नाम से जानती थी
उ- मणा।
3.शबर को अपना घर या लगता था
उ- बूचड़खाना।
4.शबर अपने घर-प रवार य छोड़ दे ती है
उ. अपनी आ म उ न त के लए।
5. शबर कहाँ चल जाती है
उ- प पासर। मतंगा म म।
6.शबर म कन कन का संगम है ?
उ--महाभाव के साथ
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ानबोध एवं भि तयोग का संगम है ।
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Question bank
1. एडवड टाइलर कौन है ?
( ाचीन मानव वै ा नक, अथ शा
ी, भष वर, दशक)
2. भारतीय परं परा के अनुसार सम कृ त के कतने अवयव है ?
( एक, पाँच, सात, दस)
3. सोशल एवं क चरल डाइनै म स कसक रचना है ?
( बैजनाथ, पट रम सोरो कन, एस.राधाकृ णन, मैडम यू र)
4. सामािजक वचारधारा कसक रचना है ?
( रवी
नाथ मुकज , महादे वी वमा, दनकर, अ मताभ ब चन)
5. स यता बबरता के व
जी वत रहने क दशा है - यह कसने कहा?
(डाँ सैमुअल जाँनसन, डाँ बैजनाथ पुर , राजे
साद, दनकर)
6. चेतना मक सं कृ त ------------ पर नभर होती है।
(ई वर , इि
याँ,धन, भि त)
7. सं कृ त के योगा मक प
को -------- कहते है ।
( स यता, संक प, भावना, आ या मकता)
8.
वामी ववेकान द के गु का नाम या है?
( ीरामकृ ण परमहं स, ीबु , मह ष अर व द, रमण मह ष)
9. भारत के रा
य आदश है ----------।
( याग और सेवा, धन-दौलत, खाना-पीना, कमाना-खच करना)
10. शि त ह जीवन और --------- ह मृ यू है ।
( कमज़ोर , भय, लालसा, ह मत)
11. हम कसक तरह सहनशील होना चा हए?
( सूरज , पृ वी माता, कण, इ
)
12. हम नेत ृ व के थान पर -------- करना चा हए।
(सेवा, शासन, डकैती, भोग)
13. वामी ववेकान द का ज म थान ------------ है ।
( कलक ता, मैसूर, केरल, पंजाब)
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14. वामी ववेकान द कस पर व वास रखते ह?
(स या सय पर, नवयुवक पर, बूढ़ पर, वदे शय पर)
15. जो अपने आप पर व वास नह ं करता वह --------- है ।
(आि तक, नाि तक, डरपोक, आलसी)
16. भारत एक है - कसक रचना है ?
(पं.जवहरलाल नेह , रामधार संह दनकर, हज़ार
साद
ववेद )
17. ाकृ तक ि ट से भारत वष को कतने भाग म बाँटा है ?
(तीन, पाँच, आठ, नौ)
18. भारतवासी कहाँ खप नह ं हो सकते?
( अपने पडो सय के बीच, अ य दे श के लोग के बीच, पहाड के बीच, जंगल म)
19. भारत ने कब राजनी तक वतं ता ा त क ?
(1947 म, 1845 म , 1950 म,1960 म)
20. इन म कौन सा पहलू लोकस ता के नह ?ं
(राजनी तक यव था, आ थक रा ता, नै तक णाल , नैि ठक
21. लोकत
मचय)
एक ----------------- है ।
( धम, कम, व वास, नी त)
22. सं कृ त और अपसं कृ त कसका लेख है ?
( कशन पटनायक, वीरे
23. मनु य क
कुमार, महादे वी वमा, जैने
कुमार)
वाय तता ह ---------------- है ।
(सं कृ त, स यता, यश, लडाई)
24. सं कृ त म --------- तरह क वकृ तयाँ आ सकती है ।
( दो, पाँच, नौ, सात)
25. ी नारायण गु का ज म कस जा त म हु आ?
(ई वा, नंबू त र, पुलया, नायर)
26. ी नारायण गु को ------ ने योगा यास सखाया।
(अ पाजी, अ यावजी, केल पजी, माडन)
27. आयुव दक प त का संपूण सा ह य ------ भाषा म उपल ध है ।
(त मल, सं कृ त. मलयालम, अं ेज़ी)
28. नारायणगु क मृ यू कब हु ई?
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(20 सतंबर 1928 म, 25 अकतूबर 1945, 30 दसंबर 1950
29. श ा के समय नानू का घ न ठ म
कौन था?
(कु हु कु हु प ण कर, रामन प लै, ववेकान द, ीमूलम त नाल)
30. ीनारायण गु के गु का नाम या था?
चे ब
ती मूता प लै, सदान द वामी, गाँधीजी, परमे वरन)
31. नारायणगु को कहाँ उ च श ा ाि त के लए भेजा ?
( क नाग पि ल, को यम, त न करा, को लम)
32. अ यनकाल का ज म कब हु आ?
( 1863 आग त 28 को, 1860 जुलाई 16 को, 1910 जून 12 को)
33. अ यनकाल के माता- पता कौन थे?
( अ यन और माला, माडन और कु ी, वेलू और च ता, पीतांबरन और मालू)
34. कसने अ यनकाल को द लत का राजा कहा?
(गाँधीजी ने, महाराज वा त त नाल ने, ानारायण गु ने , ज़मी दार परमे वरन ने)
35. ी नारायण गु ने कहाँ शव लंग क
त ठा क ?
(चाव काडु म, अ व पुरम म , चा त नूर म, वडानूर म)
36. केरल क लत जनता का पहला सर वती मि दर कहाँ था ?
(व डा नूर म, तृ ताला म, चेतला म, अ बल पु ा म)
37. काल के पता कसके का तकार एवं मज़दूर थे?
( ज़मी दार परमे वरन, कु न प लै, मूता प लै, ीमूलम त नाल महाराज)
38. साधुजन प रपालन संघम का अ य
कौन था?
(अ यनकाल , नारायणगु , माडन, नानू)
39. इन म कस जा त के लोग द लत या अवण कहा जाता था?
(नायर,
य, पुलय, नंबू त र)
40. अ यनकाल क मृ यू कब हु ई?
(सन ्1941 जून 18 को, स1898 जुलाई 16 को, 1935 सतंबर24को, 1950 अकतूबर 25को)
41. अ यनकल का पहला ल य या था?
(राह चलने क आज़ाद , पढे - लखने क आज़ाद , मि दर म वेश पाना, कपडे पहनने क आज़ाद )
42. गौतम बु के अनुसार मनु य क मूल ि थ त ----- क है ।
(सुख, दुख, आन द, संताप)
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Answers
1. ाचीन मानव वै ा नक
2. पाँच
3. पट रम सोरो कन.
5. डाँ.सैमुअल जाँनसन
6.इि
7.स यता
8. ीरामकृ ण परमहं स
9. याग और सेवा.
10.कमज़ोर
11. पृ वी माता
12. सेवा
13. कलक ता
14. नवयुवक पर
15. नाि तक
16.रामधार संह दनकर
17. तीन
18.अ य दे श के लोग के बीच
19. 1947 म
20.नैि ठक
22. कशनपटनायक
23. सं कृ त
24. दो
25. ई वा
26. अ यावजी
27. सं कृ त
28. 20 सतंबर 1928 म
29. कु हु कु हु प ण कर
30. चे ब ंती मूता प लै
31. क नाग पि ल
32. 1863 आग त 28 को
33. अ यन और माला
34. गाँधीजी ने
35. अ व पुरम म
36. वडडा नूर म
37.ज़मी दार परमे वरन
38. अ यनकाल
39.पुलय
40.सन ्1941 जून 18 को
41. राह चलने क आज़ाद
42. दुख
4.रवी
नाथ मुकज .
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मचय
याँ
21. धम
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