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UNIVERSITY OF CALICUT COMPARATIVE LITERATURE 400 BA HINDI

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UNIVERSITY OF CALICUT COMPARATIVE LITERATURE 400 BA HINDI
COMPARATIVE LITERATURE
BA HINDI
IV SEMESTER
COMPLEMENTARY COURSE
(2011 Admission)
UNIVERSITY OF CALICUT
SCHOOL OF DISTANCE EDUCATION
CALICUT UNIVERSITY P.O., MALAPPURAM, KERALA-679 635.
400
School of Distance Education
UNIVERSITY OF CALICUT
SCHOOL OF DISTANCE EDUCATION
BA HINDI
1V SEMESTER
COMPLEMENTARY COURSE
COMPARATIVE LITERATURE
Prepared By:
Dr.P.Priya
Asst.Professor,
Dept.of.Hindi
Govt.Arts&Science College,
Meenchanda,Calicut
Scrutinised By:
Dr.Pavoor Sasheendran,
38/1294, ‘Appughar’,
Edakkad P.O.,
Calicut-5
Lay out : Computer Section, SDE.
©
Reserved
Comparative Literature
Page 2
School of Distance Education
वषय सच
ू ीः
Unit -1
तल
ु ना मक सा ह य: अथ प रभाषा एवं
Unit-2
तुलना मक सा ह य,रा
Unit-3
तुलना मक सा ह य म अनव
ु ाद क भू मका
Unit-4
ह द और मलयालम
व प
य सा ह य, व व सा ह य तथा सामा य सा ह य
म तुलना मक सा ह य
Books for Reference:
1. तल
ु ना मक सा ह य भारतीय प रप्रे य –
इ द्रनाथ चौधरु
2. प्रतीक क व सु म ानंदन पंत और जी.शंकर कु प –डॉ .एन च द्रशेखरन नायर
3. हंद सा ह य का इ तहास
Comparative Literature
डॉ नगे द्र , डॉ.हरदयाल
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School of Distance Education
Comparative Literature
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School of Distance Education
UNIT-1
तुलना मक सा ह य : अथ प रभाषा एवं
प्र येक लेखक के
समूचे मानव समाज क
वारा र चत सा ह य एक पण
ू इकाई है तथा वह इकाई
सावभौम सज
ृ ना मकता क
सा ह य, (weltliteratur) क
व प
प रचायक है ।गोयते , व व
अवधारणा को फैलाने म जट
ु गए थे। भारत म
रवी द्रनाथ ठाकुर , व व सा ह य, को
प ट कर रहे थे क यह
प ृ वी व भ न टुकड
म बँट हुई लोग के रहने का अलग अलग र चत सा ह य नह ं है । प्र येक लेखक के
वारा र चत सा ह य एक पूण इकाई है और यह समूचे मानव समाज क सावभौम
सज
ृ ना मकता क
प रचायक है ।
व व सा ह य िजसको अं ेजी म ,क पैरे टव
लटरै चर, कहा जाता है इस सावभौम सज
ृ ना मकता क अ भ यि त है ।
अथ
तुलना मक सा ह य अं ेजी के क पैरे टव लटरै चर का हंद अनुवाद है ।
वदे श म इसे साँ कृ तक अ ययन के नाम से
मै यू आना ड सन ् 1848 म अपने एक प
भी जाना जाता है ।अं ेजी के क व
म सबसे पहले क पैरे टव लटरै चर पद
का प्रयोग कया था। रे ने वेलक के अनस
ु ार, तल
ु ना मक श द म तल
ु ना करने क
प्र
या जड
कया जाता है
ु ी हुई है और तल
ु ना म व तओ
ु ं को कुछ इस प्रकार प्र तत
ु
िजससे उनम सा य या वैष य का पता लग सके। इसी
ि ट से अं ेजी म
तुलना मक श द का प्रयोग लगभग सन ् 1598 से हो रहा है
ाि सस मेयस ने इसी अथ को
यान म रखकर एक पु तक
य क इसी समय
लखी थी िजसका
शीषक था, ,ए क पैरे टव ड कोस ऑफ आवर इंग लश पोय स वद द
ीक लै टन
एंड इटा लयन पोय स ।पर तु तल
ु ना वक तथा सा ह य –इन दो श द
का यु म
प्रयोग करते हुए पहले पहल मै यू आना ड ने तुलना मक सा ह य पद क सिृ ट क ।
सन ् 1886 म अपनी एक पु तक का शीषक क पैरे टव लटे रेचर रखकर
सवप्रथम एच.एम.पॉसनट ने इस व या शाखा को
कया था। बाद म 1901 म कॉ टपोरे र
था य व प्रदान करने का प्रय न
र यू म द साइ स ऑफ कंपैरे टव लटरे चर
के नाम से उनका एक लेख भी प्रका शत हुआ।अतः हम कह सकते है क बीसवीं सद
क शु आत से क पैरे टव लटरै चर पद का प्रयोग श
Comparative Literature
हो गया था।
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सा ह य का प्राथ मक अथ था , ान या सा ह य , का अ ययन ।मगर बाद
म इसका अथ हो गया , कसी भी भाषा ,समय या दे श म ल खत रचनाओं का समह
ू -
(Literature is ‘Literary production in general’ or the body of writings in a period ,country,or region-Rene
Weleck) प्रो.लेन कूपर कहते है
क सं
क तल
ु ना मक सा ह य सा ह य के तल
ु ना मक अ ययन
त अ भ यि त है ।और उनके अनुसार यह एक बनावट श द है िजससे न तो
कोई अथ नकलता है और न यह याकरण स मत ह प्रामा णत हो पाता है ।इस तरह
तल
ु ना मक सा ह य का मतलब होगा, तल
ु ना मक यु पि त। ा स म Litterature का अथ
है , सा हि यक अ ययन।और इस लए उ नीसवीं शती के प्रारं भ म ह तुलना मक सा ह य
या सा हि यक अ ययन (Litterature Comparee) जैसे पद क सिृ ट हुई।
इसका अथ है , सा ह य का तल
ु ना मक व ान।
लेचर के अनस
ु ार
प रभाषा
तुलना मक सा ह य एक से अ धक भाषाओं म र चत सा ह य का
अ ययन है और तल
ु ना इस अ ययन का मु य अंग है । मगर
तुलना मक सा ह य एक
वतं
ोचे का कहना है क
व यानश
ु ासन बन ह नह ं सकता
य
क कसी भी
सा हि यक अ ययन के लए तुलना एक आव यक अंग है ।चाहे एक भाषा म ल खत
सा ह य का अ ययन हो अथवा एक से अ धक भाषाओं म
ल खत तुलना मक
है और इसी लए तुलना मक सा ह य को
ल खत सा ह य के
सा ह य का अ ययन हो,दोन ह ि थ तय म अ ययन का के द्र य वषय सा ह य ह
अ ययन से अलग नह ं कया जा सकता।
सं
तुलना मक सा ह य
त घटक
क
कसी एक भाषा म
म व भ न भाषाओं म र चत सा ह य अथवा उनके
सा हि यक तल
ु ना होती है और यह
उसका आधार त व है ।
तुलना मकता एक वशेष प्रकार क मान सकता अथवा मान सक
कहना है क तुलना मकता सां ले षक मान सक
जातीय
ि ट है िजसके
ि ट है ।रे माक का
वारा भौगो लक एवं
तर पर सा ह य का अनस
ु ंधाना मक व लेषण संभव हो पाता है ।य द एक ह
भाषा म ल खत सा ह य के अंतगत दो समान या असमान
प या प्रविृ तय का
तुलना मक अ ययन कया जाए तो इसको तुलना मक अ ययन कहना संभव नह ं,
य क इसम सां ले षक मान सक
तुलना कसी एक रा
ि ट के व तार क संभावना नह ं होगी।मगर जब
क प र ध को पार करके दस
ू रे भाषाओं म ल खत सा ह य को
भी अपने म समेट लेती है तो उसको न चय ह तल
ु ना मक सा ह य कहा जाएगा।
Comparative Literature
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या फर बंगाल या आं
अथवा महारा
सा ह य रचना करते है तो उनक
म रहने वाला लेखक एक ह
हंद भाषा म
थानीय राजनी तक तथा सामािजक प रवेश से
प्रभा वत सा ह य म वषय-व तु, शैल तथा टोन म अंतर आ जाता है और उनका
अ ययन भी तुलना मक सा ह य क प र ध के अंतगत समा व ट हो जाता है ।
इसके अ त र त तल
ु ना मक सा ह य का
कला, दशन, धमशा
समेटता है । हे नर
, मने व ान तथा समाज
े
ान के दस
ू रे
े
को जैसे
व ान आ द को भी अपने म
एच.एच.रे माक के अनस
ु ार तल
ु ना मक सा ह य एकक रा
प र ध के परे दस
ू रे रा
के सा ह य के साथ
क
तुलना मक अ ययन है तथा यह
अ ययन कला, व ान, इ तहास, मनो व ान,धमशा
आद
के आपसी संबध का भी अ ययन है ।
ान के व भ न
े
उल रच वाइन
टाइन ने अपनी पु तक, कंपेरे टव लटरे चर एंड लटरे र
(क) पॉल वां
टगहे म (Paul Van Tieghem), याँ-मा र कारे (Jean-Marie
थयोर ,(1973) म तल
ु ना मक सा ह य क
Carre)तथा मा रओस
व भ न प रभाषाओं को दो वग म बाँटा है ः
ा वास गुइयाद (Marius Francois Guyard) जैसे पै रस तथा जमन
कूल के परं परावा द
व वान
क
संकु चत संक पनाओं से जड
ु ी हुई प रभाषाएँ
तुलना मक सा ह य के अ ययन म सा हि यक इ तहास के त व को अ धक मह व
दे ती है ।इन व वान का प्र तपा य है क तुलना मक सा ह य एक इ तहास स मत
अनश
ु ासन है िजसको का यशा
ीय स दयमूलक अनश
ु ासन के साथ जोडा नह ं जा
सकता, य क ठोस यथाथ, त या मक चेतना तथा
के,कृ त,पाठक के संब ध के साथ इसका संपक होता है ।
व दवान
के कृ तकार
(ख) रे ने वेलक,रे माक, ऑि टन वारे न तथा प्रावर जैसे उदारतावाद
को अमर क
कूल के अंतगत
थान
दया जाता है िज ह ने अपनी
प रभाषाओं म तल
ु ना मक सा ह य के अ ययन म
कलापरक
व भ न रा
ि ट को मह व दया है ।इनके अ त र त
सी
का यशा
ीय स दयमल
ू क
कूल के व वान के लए
तुलना मक सा ह य एक सा वक सा हि यक संविृ त का सार-सं ह है । यह संविृ त
(phenomenon) अंशतः
व भ न दे श के जनसमूह के सामािजक जीवन के ऐ तहा सक
वकास पर आधा रत है तथा अंशतः पार प रक सां कृ तक तथा सा हि यक आदान-
प्रदान पर नभरशील है ।
Comparative Literature
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झुरमुनि क का कहना है क पूव नधा रत नयम के अनस
ु ार कला एवं
सा ह य का वकास होता है और मानव जगत के सामािजक तथा ऐ तहा सक वकास
के यह समानांतर होता है ।अतएव समाज सा ह य का आव यक अधः तर है और
सा ह य संयोग से उसक अ धरचना है ।
पै रस जमन
कूल (तुलना मक सा ह य का
ाि ससी संप्रदाय)
गुइयारद क पु तक ‘La Literature Comparee’ क भू मका लखते हुए
कारे ने तुलना मक सा ह य को सा ह ये तहास का एक भाग कहा है । यह अंतरा
आ याि मक
संब ध
का
कारलाइल, कॉट तथा
अ ययन
वगने अथवा
तथा
बायरन
और
व भ न भाषाओं म
पुि कन,गोयते
य
तथा
ल खत सा ह य
के
लेखक ,जीव नय ,प्रेरणाओं तथा कृ तय के त यानप
ु रक संपक क छानबीन है । य द
त यानुपरक संपक
के अ ययन का अथ मा
तल
ु ना मक सा ह य अपने स मा नत
सा ह य का स दयमूलक प
वषय सं ह है तो
प को खो बैठता है
न चय ह
य क ऐसा करने पर
बेमानी हो जाता है । त यानप
ु रक संपक के आधार पर
तल
ु ना मक सा ह य के अ ययन का अथ है - उसक प र ध से सा ह यालोचन को
हटाकर मा
वषय सं ह को तुलना मक सा हि य मान लेना। व तुतः तुलना मक
सा ह य के
ा सीसी व वान क पहल पीढ सा ह य सुर ा के आधार पर अ भनव
प रवतन तथा प त को नकारते हुए त या मक संपक तथा द तावेज के व लेषण
पर
यादा बल दे ती रह ।
ा सीसी व वान ने यावहा रक ठोस आलोचना मक
क सहायता से तुलना मक सा ह य के
प्रभाव के सू
े
ि ट
म सा य या वैष यमूलक तुलना तथा
के अ ययन का प्रसार करते हुए सं लेषणा मक
कया। ए तय बल (Etiemble) यॉन (Jeune),तथा पीशवाज और
ि ट को
वीकार
सो का योगदान इस
ि ट से सबसे मह वपूण है िज ह ने तुलना मक सा ह य के संदभ म सं लेषणा मक
अ ययन का प्रसार कया।
रे ने वेलेक तुलना मक सा ह य के संदभ म
का
वरोध करते हुए कहते ह
Comparative Literature
क
वआधार
वआधार (binary) अ ययन
अ ययन का मतलब है
क हम
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तुलना मक सा ह य को सा ह य के
वदे श वा ण य के
होगा। कसी भी भाषा म ल खत मा
उ ह ं कृ तय का अ ययन संभव होगा िजनका
कोई
वदे शी
प म ह
वआधार संब ध है और इस तरह कृ त वशेष का
संभव नह ं होगा। रे ने वेलेक ने
वीकार करना
वतं
व लेषण
वआधार अ ययन को तल
ु ना मक सा ह य के लए
संक ण अ ययन माना है ।मगर टगहे म ने
वआधार अ ययन को ह तल
ु ना मक
सा ह य मानते हुए उसे ,सामा य सा ह य, से अलग बताया जहाँ नाना सा ह य म
पाये जानेवाले सामा य त व का अ ययन कया जाता है ।
पै रस-जमन
कूल के
व वान
क
ि ट ,वै ा नक, है । उनके मूल
प्र तपा य के अनुसार तल
ु ना मक सा ह य का यशा
ीय स दया मक कलापरक
अनश
ु ासन नह ं वरन ् एक ऐ तहा सक अनश
ु ासन है ।इसका संब ध ठोस यथाथ से है
तथा व भ न रा
के कृ तकार , कृ तय , पाठक तथा दशक के त या मक, सचेतन
न चेय संपक से भी है ।पै रस-जमन
कूल ने व तत
ु ः व भ न सा ह य क आपसी
संब ध , प्रभाव-सू , आदान-प्रदान,
पांतरण
है ।और इस
कूल के अनुसार तुलना मक सा ह य
ि ट से पै रस जमन
का कारण-संब धी अ ययन
कया
व वध
सा ह य के पार प रक-संब ध का अ ययन है ।
अमर क
कूल
तुलना मक सा ह य का अमर क
संरचना के अंतगत तल
ु ना मक सा ह य के
ान के दस
ू रे
प म
सा
े
यता,मो टफ,शैल
एक मह वपण
ू अंग के
ले वन, डे वड मेलोन आ द
प , वधा,सा हि यक आंदोलन तथा परं परा क
वारा सा हि यक कृ तय के कला मक
तुलना मक सा ह य के अंतगत
ान के
े
का
अथ
है
सा ह य
का
व वान
ने
तुलना मक
व प को उ घा टत कया है ।
तथा प्रती तय क छानबीन सा हि यक
त य को प्रकाश म लाने के लए मह वपण
ू ह।व तुतः जमन भाषा म
सा ह य
सामा य
थान को नधा रत करता हुआ एक ओर
के साथ सा ह य के संब ध का अ ययन
वीकारता है । रे ने वेलेक,है र
छानबीन के
कूल सा ह ये तहास क
तुलना मक
व ान।
तुलना मक
तुलना मक
सा ह य
सा ह ये तहास का व लेषण है िजसम व भ न सा ह य के पार प रक यथाथ संब ध
Comparative Literature
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क छानबीन क जाती है । तुलना मक सा ह य सा ह य के
होता है और यह सा ह यालोचन का
आलोचना को इसके
े
स ा त का अ ययन
व लेषण है । इसके प्रारं भक
से बाहर रखा था
व वान
ने
य क उनके अनस
ु ार आलोचना मू यांकन
के लए बा य करती है और सा ह य के तुलना मक ऐ तहा सक त य के
न प
ववेचन म बाधा उपि थत होती है ।रे नेवेलेक का कहना है क सा ह य के इ तहास के
लए त य
का चयन भी अपने आप म एक आलोचना मक
मू यांकनपरक भी है ।हमार
या है तथा वह
चंतन धारा के पीछे एक परं परा रहती है िजसे हम
सामािजक संदभ कहते है जो एक सामािजक प रवेश से संबि धत सं कृ त का एक
ह सा होता है इसी लए सा ह य को उसके सामािजक या सां कृ तक एवं दाश नक
आधार तथा ऐ तहा सक संदभ से काटना असंभव है इसी लए सा ह य का अ ययन
अनायास ह अंतर व यावत बन जाता है । सा ह य क तुलना
ान के दस
ू रे
े
के
साथ संभव है और इसी लए वह तुलना मक सा ह य का वषय भी है ।आंदाल तथा
मीराबाई क धा मक वचारधाराओं का व लेषण करते हुए जब अ वैत रह यवाद के
वतं
ववेचन के साथ इनके सा ह य क तल
ु ना क जाती है तब न चय ह यह
अ ययन तुलना मक सा ह य के अंतगत
थान पा जाता है ।रे माक क प रभाषा को
आधार बनाकर तल
ु ना मक सा ह य क प रभाषा
तुलना मक सा ह य एक
वतं
र चत सा ह य क एक संपण
इकाई के
ू
इस प्रकार प्र तत
ु क जा सकती है ः
वषय है िजससे
प म
व भ न भाषाओं म
यापक पहचान क और अ धक
संभावना बनती है ।य़ह काम केवल व भ न भषाओं म र चत सा ह य क तुलना से
ह संभव हो सकता है ।ता पय है
क तुलना मक सा ह य के अ ययन म
े ीयता
अथवा भौगो लकता तथा वैचा रक जा तगतता के आ य से सा ह य के व लेषण
का
प्रसार होता है ।
तुलना मक सा ह य का
तुलना मक सा ह य के
तुलना मक सा ह य के
ा सीसी जमन
व प
कूल तथा अमर क
कूल ने
व प को या या यत करते हुए उसक नाना वशेषताओं का
उ लेख कया है । दोन संप्रदाय के व वान इस बात से सहमत ह क तुलना मक
सा ह य सा हि यक सम याओं का
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यान है जहाँ एक से अ धक सा ह य का उपयोग
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कया जाता है । स ाि तक
ि ट से तुलना या तो आंतरभा षक प रप्रे य से जुडी हो
सकती है जहाँ तुलनीय व भ न सा हि यक कृ तयाँ एकक सा ह यानश
ु ासन से संब ध
होती है ।नह ं तो यह तल
ु ना अंतःभा षक प रप्रे य से संब ध होती है जहाँ तल
ु ना एकक
सा ह यानश
ु ासन क प र ध को पार कर दस
ू र भाषाओं म ल खत सा ह य को अपने
म समेट लेती है । तुलना मक सा ह य मूलतः अंतःभा षक प रप्रे य से जुडा हुआ
तुलना मक अ ययन है ।
सा ह ये तहास का कोई भी ववेचन आलोचना क सहायता के बना संभव
नह ं
य
क सा ह य म केवल मत
ृ त व नह ं होते,प्रासं गक त य होते है ।इस लए
तुलना मक सा ह य के अ ययन म तल
ु ना मक आलोचना का योग
वाभा वक है और
आलोचक
सु प ट
आव यक भी।इ लयट का तो यहाँ तक कहना है क तल
ु ना तथा वशेषण कसी भी
के
मह वपूण
औजार
है ।मगर
तुलना मक
सा ह य
ढं ग
से
तुलना मक होता है ।बु दोव बोस का कहना है क यह व भ न दशन ाह अ ययन
होता है ।
व तुतः तुलना मक सा ह य एक ओर जहाँ एकक सा ह या ययन को एक
ऐसी प त प्रदान करता है िजससे प रप्रे य का
रा
व तार हो सके वहाँ दस
ू र ओर
य प र ध क संक णता को तोडता हुआ व भ न रा
प्रकृ तय
य सं कृ तय म प्रभा वत
आंदोलन क खोज करता है एवं मनु य क दस
ू र
साथ सा ह य के संब ध
को तोलता है । तल
ु ना मक सा ह य रा
इ तहास के झठ
ू े अलगाव के
तुलना मक प्र
प म व ले षत करना है ।
याओं के
य सा ह य के
खलाफ लडता है ।इसका अथ यह भी नह ं
या का उ े य तारत यता का
प्र त व द के
ाना मक
क इस
ववेचन है । यानी एक को दस
ू रे के
तुलना मक सा ह य का प्रारं भक अ ययन सन ् 1800 म मॉडम द
कया। इ ह ने मूलतः सा ह ये तहास और सा ह य तथा समाज के
तयाल ने शु
संब ध-सू
का अ ययन
कया। इससे दो साल पहले (1978)
े ड रक
लेगल ने
,यू नवेसल पोयजी, क अवधारणा म तुलना मक सा ह य क सावदश यता को जोडकर
स दयबोधक का यशा
सा ह य क
बात कह
Comparative Literature
ीय
ि ट का प्रसार कया था। उसके उपरा त गोयते ने व व
िजसका अथ था एक ऐसी सामा य
वरासत िजसक
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अ भ यि त
े ठ क वय
और स दय बोध के लेखक
वारा होती है । और जो
मानवता म न हत सावजनीनता को प्रकाश म लाती है ।दरअसल तुलना मक सा ह य
सा हि यक अ ययन क
ऐसी शाखा है जो प्र येक दे श और काल क सा हि यक
अ भ यि त क मूलभत
ू संरचना से संब ध है ।यह कारण है क रवी द्रनाथ टै गोर ने
भी इसको , व व सा ह य कहा था।
व भ न सा हि यक अ ययन म तुलना का प्रयोग मूलतः सा
संब ध,परं परा
ववेचन तथा प्रभाव-सू
क
खोज के
लए
कया जाता है ।सा
य
य
संब धी ववेचन म दो कृ तय का शैल गत,संरचनागत, मूड या वचारगत व लेषण
कया जाता है ।परं परा या र त से ता पय है ऐ तहा सकता क
कालानस
ु ार या कालगत
ि ट से संब ध एक ह
ि ट से अथवा,
वग के समतु य कृ तय
क
सा यमूलक तुलना। रामायण क सीता के सात ,कौ डय से खर दा , क ना यका क
तुलना अथवा उप नष
गीत
क
अ ययन
तुलना
क दाश नक अ भ यि त के साथ रवीं द्रनाथ के पज
ू ा- वषयक
मशः सा
य संब धी अथवा परं परा
वीकार कया जाएगा।इसी तरह प्रभावसू
ववेचन का तल
ु ना मक
का ववेचन भी तुलना मक होता
है । नराला पर रवीं द्र का प्रभाव अथवा रवीं द्र पर शैल ,उप नषद तथा कबीर का प्रभाव
तुलना मक प्रभाव ववेचन है ।
तुलना मक सा ह य के अ ययन को मूल
मानकर एक का लक अथवा कला मक
प से ऐ तहा सक अथवा काल
ि ट से एक
वतं
संपण
ू प्रणाल ह माना
जाता है । तुलना मक सा ह य को लेकर अनेक वाद ववाद भी है , रे माक जैसे
इसे
वतं
मानते है तो नरे श गुहा जैसे लोग इसे परू क वषय के
तल
ु ना मक सा ह य क
वतं
मक न
लोग
प म मानते है ।
एवं स मा नत ि थ त का उ लेख करते हुए
डे वड.एच.मेलोन कहते है क तल
ु ना मकतावाद आलोचक इस लए तल
ु ना मकतावाद
आलोचक नह ं है
य क वह एक के
करना चाहता है बि क वह एक के
काम करना चाहता है
Comparative Literature
थान पर दो-तीन सा ह य को लेकर काम
थान पर दो तीन सा ह य को लेकर इस लए
य क वह तुलना मकवाद आलोचक है ।
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जवाब ल खए
1. रवीं द्रनाथ ठाकुर के अनुसार व व सा ह य का अथ
यह
या है ।
प ृ वी व भ न टुकड म बँट हुई लोग के रहने का अलग अलग र चत
सा ह य नह ं है । प्र येक लेखक के
वारा र चत सा ह य एक पण
ू इकाई है और यह
समच
ू े मानव समाज क सावभौम सज
ृ ना मकता क प रचायक है ।
व व सा ह य
िजसको अं ेजी म ,क पैरे टव लटरै चर, कहा जाता है इस सावभौम सज
ृ ना मकता क
अ भ यि त है ।
2. रे ने वेलक के अनस
ु ार तल
ु ना मक सा ह य क प रभाषा
या है ।
रे ने वेलक के अनस
ु ार ,तुलना मक श द म तुलना करने क प्र
या जुडी हुई
है और तुलना म व तओ
कया जाता है िजससे उनम
ु ं को कुछ इस प्रकार प्र तत
ु
सा य या वैष य का पता लग सके।
3. प्रो.लेन कूपर के अनस
ु ार तुलना मक सा ह य का अथ
प्रो.लेन कूपर के अनुसार
क सं
या है ।
तल
ु ना मक सा ह य सा ह य के तुलना मक अ ययन
त अ भ यि त है ।और यह एक बनावट श द है िजससे न तो कोई अथ
नकलता है और न यह याकरण स मत ह प्रामा णत हो पाता है ।
ोचे के अनस
ु ार तुलना मक सा ह य का अथ
4.
या है ।
ोचे के अनस
ु ार तल
ु ना मक सा ह य एक
सकता
य
वतं
व यानश
ु ासन बन ह नह ं
क कसी भी सा हि यक अ ययन के लए तल
ु ना एक आव यक अंग
है ।चाहे एक भाषा म ल खत सा ह य का अ ययन हो अथवा एक से अ धक भाषाओं
म ल खत तुलना मक सा ह य का अ ययन हो,दोन ह ि थ तय म अ ययन का
के द्र य वषय सा ह य ह है और इसी लए तल
ु ना मक सा ह य को कसी एक भाषा
म ल खत सा ह य के अ ययन से अलग नह ं कया जा सकता।
5. तुलना मक सा ह य का आधार त व
तुलना मक सा ह य
सं
म
या है ।
व भ न भाषाओं म र चत सा ह य
अथवा उनके
त घटक क सा हि यक तुलना होती है और यह उसका आधार त व है ।
Comparative Literature
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6. तुलना मक सा ह य से संबि धत रे माक क राय
रे माक का कहना है
या है ।
क तुलना मकता सां ले षक मान सक
वारा भौगो लक एवं जातीय
ि ट है िजसके
तर पर सा ह य का अनस
ु ंधाना मक व लेषण संभव हो
पाता है ।य द एक ह भाषा म ल खत सा ह य के अंतगत दो समान या असमान
या प्रविृ तय का तल
ु ना मक अ ययन
प
कया जाए तो इसको तल
ु ना मक अ ययन
कहना संभव नह ं , य क इसम सां ले षक मान सक
नह ं होगी।मगर जब तुलना कसी एक रा
ि ट के व तार क संभावना
क प र ध को पार करके दस
ू रे भाषाओं
म ल खत सा ह य को भी अपने म समेट लेती है तो उसको न चय ह तुलना मक
सा ह य कहा जाएगा।
7. हे नर एच.एच.रे माक के अनस
ु ार तुलना मक सा ह य का अथ
या है ।
हे नर एच.एच.रे माक के अनस
ु ार तुलना मक सा ह य एकक रा
परे दस
ू रे रा
के सा ह य के साथ
क प र ध के
तुलना मक अ ययन है तथा यह अ ययन कला,
व ान, इ तहास, मनो व ान,धमशा
आद
ान के व भ न
े
के आपसी संबंध
का भी अ ययन है ।
8. कंपेरे टव लटरे चर एंड लटरे र
उल रच वाइन
9. पै रस तथा जमन
पॉल
मा रओस
वां
थयोर
कसक पु तक है ।
टाइन क ।
कूल के परं परावा द व वान कौन कौन ह।
टगहे म(Paul Van Tieghem), याँ-मा र
कारे
(Jean-Marie Carre)तथा
ा वास गुइयाद (Marius Francois Guyard) आ द।
10. रे ने वेलक,रे माक, ऑि टन वारे न तथा प्रावर जैसे उदारतावाद
व दवान को
कस
कूल के अंतगत रखा गया है ।
अमर क
कूल के अंतगत ।
11. तुलना मक सा ह य के संदभ म सं लेषणा मक अ ययन का प्रसार कन लोग ने
कया।
इस
ए तय बल (Etiemble) यॉन (Jeune),तथा पीशवाज और
ि ट से सबसे मह वपण
है
ू
सो का योगदान
िज ह ने तल
ु ना मक सा ह य के संदभ म
सं लेषणा मक अ ययन का प्रसार कया।
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12.तुलना मक सा ह य म
वआधार (binary) अ ययन से संबि धत रे ने वेलक का वचार
य त क िजए।
रे ने वेलेक तुलना मक सा ह य के संदभ म
वरोध करते हुए कहते ह क
वआधार अ ययन का मतलब है क हम
सा ह य को सा ह य के वदे श वा ण य के
भाषा म ल खत मा
वआधार
वआधार (binary) अ ययन का
प म ह
वीकार करना होगा। कसी भी
उ ह ं कृ तय का अ ययन संभव होगा िजनका कोई वदे शी
संब ध है और इस तरह कृ त वशेष का
होगा।रे ने वेलेक ने
तल
ु ना मक
वआधार
वतं
व लेषण संभव नह ं
अ ययन को तुलना मक सा ह य के
लए संक ण
अ ययन माना है ।
13. पै रस-जमन
कूल के स ा त को य त क िजए।
पै रस-जमन
कूल के व वान क
अनस
ु ार तुलना मक सा ह य का यशा
ि ट वै ा नक, है । उनके मूल प्र तपा य के
ीय स दया मक कलापरक अनश
ु ासन नह ं
वरन ् एक ऐ तहा सक अनश
ु ासन है ।इसका संब ध ठोस यथाथ से है तथा साथ ह
व भ न रा
के कृ तकार , कृ तय , पाठक
न चेय संपक से भी है ।पै रस-जमन
तथा दशक
के त या मक, सचेतन
कूल ने व तत
ु ः व भ न सा ह य क आपसी
संब ध ,प्रभाव-सू ,आदान-प्रदान, पांतरण का कगरण-संब धी अ ययन कया है ।और
इस
ि ट से पै रस जमन
कूल के अनस
ु ार तल
ु ना मक सा ह य व वध सा ह य के
पार प रक-संब ध का अ ययन है ।
14.अमर क
कूल के व वान ने सा हि यक कृ तय के कला मक
व प को
कैसे
उ घा टत कया था।
व वान ने सा
क
यता,मो टफ,शैल प , वधा,सा हि यक आंदोलन तथा परं परा
तुलना मक छानबीन के
वारा सा हि यक कृ तय
के कला मक
व प को
उ घा टत कया था।
16.सा ह य का अ ययन अनायास ह अंतर व यावत बन जाता है –
हमार
प ट क िजए।
चंतन धारा के पीछे एक परं परा रहती है िजसे हम सामािजक संदभ
कहते है जो एक सामािजक प रवेश से संबि धत सं कृ त का एक ह सा होता है ,और
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सा ह य को उसके सामािजक या सां कृ तक एवं दाश नक आधार तथा ऐ तहा सक
संदभ
से
काटना
असंभव
है
इसी लए
सा ह य
का
अ ययन
अनायास
ह
अंतर व यावत बन जाता है ।
17. तल
ु ना मक सा ह य से संबि धत रे माक क प रभाषा
तल
ु ना मक सा ह य एक
सा ह य क एक संपण
ू इकाई के
वतं
या है ।
वषय है िजससे
प म
व भ न भाषाओं म र चत
यापक पहचान क और अ धक संभावना
बनती है ।य़ह काम केवल व भ न भाषाओं म र चत सा ह य क तुलना से ह संभव
हो सकता है ।अथात ् तुलना मक सा ह य के अ ययन म
े ीयता अथवा भौगो लकता
तथा वैचा रक जा तगतता के आ य से सा ह य के व लेषण
18. तुलना मक सा ह य के
के
ा सीसी जमन कूल तथा अमर क
का प्रसार होता है ।
कूल ने तल
ु ना मक सा ह य
व प को या या यत करते हुए दोन संप्रदाय के व वान कस बात से सहमत ह ।
दोन
संप्रदाय
के
सा हि यक सम याओं का
व वान इस बात से सहमत ह
क तुलना मक सा ह य
यान है जहाँ एक से अ धक सा ह य का उपयोग कया जाता
है ।
19. तल
ु ना मक सा ह य मल
ू तः अंतःभा षक प रप्रे य से जुडा हुआ तल
ु ना मक अ ययन
है ।
य।
स ाि तक
जहाँ तल
ु नीय
ि ट से तल
ु ना या तो आंतरभा षक प रप्रे य से जड
ु ी हो सकती है
व भ न सा हि यक कृ तयाँ एकक सा ह यानश
ु ासन से संब ध होती
है ।नह ं तो यह तुलना अंतःभा षक प रप्रे य से संब ध होती है जहाँ तुलना एकक
सा ह यानश
ु ासन क प र ध को पार कर दस
ू र भाषाओं म ल खत सा ह य को अपने
म समेट लेती है । तुलना मक सा ह य मूलतः अंतःभा षक प रप्रे य से जुडा हुआ
तुलना मक अ ययन है ।
20. सा ह ये तहास का कोई भी ववेचन आलोचना क सहायता के बना संभव नह ं।
य
य।
सा ह ये तहास का कोई भी ववेचन आलोचना क सहायता के बना संभव नह ं
क सा ह य म केवल मत
ृ त व नह ं होते,प्रासं गक त य होते है ।इस लए
तल
ु ना मक सा ह य के अ ययन म तल
ु ना मक आलोचना का योग वाभा वक है और
आव यक भी।
Comparative Literature
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21. तुलना मक सा ह य क प त
या
या है ।
व तुतः तुलना मक सा ह य एक ओर जहाँ एकक सा ह या ययन को एक ऐसी
प त प्रदान करता है िजससे प रप्रे य का व तार हो सके वहाँ दस
ू र ओर रा
प र ध क संक णता को तोडता हुआ व भ न रा
आंदोलन
क
खोज करता है एवं मनु य क
य
य सं कृ तय म प्रभा वत प्रकृ तय
दस
ू र
ाना मक
याओं के साथ
सा ह य के संब ध को तोलता है ।
22. तुलना मक सा ह य म
े ड रक लेगल क दे न
या है ।
े ड रक लेगल ने ,यू नवेसल पोयजी, क अवधारणा म तुलना मक सा ह य क
सावदश यता को जोडकर स दयबोधक का यशा
ीय
ि ट का प्रसार कया था।
23. रवी द्रनाथ टै गोर ने भी तुलना मक सा ह य को , व व सा ह य कहा था।
य।
दरअसल तुलना मक सा ह य सा हि यक अ ययन क ऐसी शाखा है जो प्र येक
दे श और काल क सा हि यक अ भ यि त क मूलभूत संरचना से संब ध है ।यह
कारण है क रवी द्रनाथ टै गोर ने भी इसको , व व सा ह य कहा था।
24. व भ न सा हि यक अ ययन म तुलना का प्रयोग कस प्रकार आता ह।
व भ न सा हि यक अ ययन म तल
ु ना का प्रयोग मल
ू तः सा
ववेचन तथा प्रभाव-सू
य संब ध,परं परा
क खोज के लए कया जाता है ।
25. तल
ु ना मक प्रभाव ववेचन माने
या
है ।
नराला पर रवीं द्र का प्रभाव अथवा रवीं द्र पर शैल ,उप नषद तथा कबीर का
प्रभाव तुलना मक प्रभाव ववेचन है ।
26. समाज सा ह य का आव यक अधः तर है और सा ह य संयोग से उसक अ धरचना
है । झरु मुनि क
य इस प्रकार कहते ह।
झरु मुनि क का कहना है
क पव
ू
नधा रत
नयम
के अनस
ु ार कला एवं
सा ह य का वकास होता है और मानव जगत के सामािजक तथा ऐ तहा सक वकास
के यह समानांतर होता है । अतएव समाज सा ह य का आव यक अधः तर है और
सा ह य संयोग से उसक अ धरचना है ।
Comparative Literature
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27. तुलना मक सा ह य से संबि धत
तुलना मक सा ह य के
ा सीसी व वान क पहल पीढ क मा यता या है ।
ा सीसी व वान क पहल पीढ सा ह य सुर ा के
आधार पर अ भनव प रवतन तथा प त को नकारते हुए त या मक संपक तथा
द तावेज के व लेषण पर
28. पै रस-जमन
यादा बल दे ती रह ।
कूल के व वान क
पै रस-जमन
ि ट ,वै ा नक, है ।कय ।
कूल के व वान क
ि ट ,वै ा नक, है कय
प्र तपा य के अनुसार तल
ु ना मक सा ह य का यशा
क उनके मूल
ीय स दया मक कलापरक
अनश
ु ासन नह ं वरन ् एक ऐ तहा सक अनश
ु ासन है ।इसका संब ध ठोस यथाथ से है
तथा व भ न रा
के कृ तकार , कृ तय , पाठक तथा दशक के त या मक, सचेतन
न चेय संपक से भी है ।पै रस-जमन
कूल ने व तत
ु ः व भ न सा ह य क आपसी
संब ध ,प्रभाव-सू ,आदान-प्रदान, पांतरण का कारण-संब धी अ ययन कया है । और
इस
ि ट से पै रस जमन
कूल के अनुसार तुलना मक सा ह य व वध सा ह य के
पार प रक-संब ध का अ ययन है ।
29. तुलना मक सा ह य का अमर क
कूल क
तल
ु ना मक सा ह य का अमर क
अंतगत तुलना मक सा ह य के
दस
ू रे
े
वचार य त क िजए।
कूल सा ह ये तहास क सामा य संरचना के
थान को नधा रत करता हुआ एक ओर
के साथ सा ह य के संब ध का अ ययन
एक मह वपण
ू अंग के
ान के
प म
वीकारता है ।
30. तुलना मक सा ह य के प्रारं भक व वान ने आलोचना को इसके
था
े
से बाहर रखा
य।
तुलना मक सा ह य के प्रारं भक व वान ने आलोचना को इसके
े से बाहर रखा था
य क उनके अनुसार आलोचना मू यांकन के लए बा य करती है और सा ह य के
तुलना मक ऐ तहा सक त य के न प
ववेचन म बाधा उपि थत होती है ।
31. सा ह य का अ ययन अनायास ह अंतर व यावत बन जाता है –इस कथन को
प ट
क िजए।
हमार
चंतन धारा के पीछे एक परं परा रहती है िजसे हम सामािजक संदभ
कहते है जो एक सामािजक प रवेश से संबि धत सं कृ त का एक ह सा होता है
Comparative Literature
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इसी लए सा ह य को उसके सामािजक या सां कृ तक एवं दाश नक आधार तथा
ऐ तहा सक संदभ से काटना असंभव है सा ह य क तुलना
ान के दस
ू रे
े
के साथ
संभव है और इसी लए वह तुलना मक सा ह य का वषय भी है ।अतः सा ह य का
अ ययन अनायास ह अंतर व यावत बन जाता है ।
32. रे माक क प रभाषा को आधार बनाकर तल
ु ना मक सा ह य क प रभाषा को प्र तत
ु क िजए।
तुलना मक सा ह य एक
सा ह य क एक संपूण इकाई के
वतं
वषय है िजससे
प म
व भ न भाषाओं म र चत
यापक पहचान क और अ धक संभावना
बनती है ।य़ह काम केवल व भ न भषाओं म र चत सा ह य क तुलना से ह संभव
हो सकता है ।अथात ् तल
ु ना मक सा ह य के अ ययन म
े ीयता अथवा भौगो लकता
तथा वैचा रक जा तगतता के आ य से सा ह य के व लेषण
का प्रसार होता है ।
33. तुलना मक सा ह य मूलतः अंतःभा षक प रप्रे य से जुडा हुआ तुलना मक अ ययन
है ।इस वचार को
स ाि तक
जहाँ तुलनीय
प ट क िजए।
ि ट से तल
ु ना या तो आंतरभा षक प रप्रे य से जड
ु ी हो सकती है
व भ न सा हि यक कृ तयाँ एकक सा ह यानश
ु ासन से संब ध होती
है ।नह ं तो यह तल
ु ना अंतःभा षक प रप्रे य से संब ध होती है जहाँ तल
ु ना एकक
सा ह यानश
ु ासन क प र ध को पार कर दस
ू र भाषाओं म ल खत सा ह य को अपने
म समेट लेती है । तुलना मक सा ह य मूलतः अंतःभा षक प रप्रे य से जुडा हुआ
तुलना मक अ ययन है ।
34. सा ह ये तहास का कोई भी ववेचन आलोचना क सहायता के बना संभव नह ं
य।
सा ह ये तहास का कोई भी ववेचन आलोचना क सहायता के बना संभव नह ं
य
क सा ह य म केवल मत
ृ त व नह ं होते,प्रासं गक त य होते है ।इस लए
तुलना मक सा ह य के अ ययन म तल
ु ना मक आलोचना का योग
वाभा वक है और
आव यक भी है ।
35. तुलना मक सा ह य के बारे म मॉडम द
तयाल का वचार
या है ।
तल
ु ना मक सा ह य का प्रारं भक अ ययन सन ् 1800 म मॉडम द
शु
तयाल ने
कया। इ ह ने मल
ू तः सा ह ये तहास और सा ह य तथा समाज के संब ध-सू
का अ ययन कया।
Comparative Literature
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UNIT-2
तल
ु ना मक सा ह य,रा
य सा ह य,
व व सा ह य तथा सामा य सा ह य
सा ह य के अ ययन के कुछ
वषय और
े
ऐसे ह जो तुलना मक
सा ह य के नकट थ ह या फर पर पर अ तछा दत ह।उदाहरण के
सा ह य
(National Literature), व व
प म रा
सा ह य(World Literature)
तथा
य
सामा य
सा ह य(General Literature)।
रा
य सा ह य
रा
िजनक
य सा ह य तुलना मक सा ह य क उन इकाइय का संकेत दे ता है
सहायता
से
तुलना मक
सा ह यानुशासन
है ।तुलना मक सा ह या ययन के लए व भ न रा
क
बु नयाद
य सा ह य का
तैयार
यापक
होती
ान एक
नणायक आव यकता है ।आर.ए साइसी ने तल
ु ना मक सा ह य क प रभाषा दे ते हुए
कहा था क तल
ु ना मक सा ह य व भ न रा
य सा ह य का एक-दस
ू रे के आ य से
तल
ु ना मक संब ध का अ ययन है ।
गोयते ने व वसा ह य (Welt Literatur)के संदभ म रा
ि थ त को
य सा ह य क
प ट करते हुए कहा है क वे ट लतरातुर अपनी सा हि यक परं पराओं का
बोध है । इस तरह व भ न रा
एक-दस
ू रे को पहचान या समझ सकते ह।गोयते का
व वास यह है क इस तरह पार प रक आदान-प्रदान तथा अ भ ान के मा यम से
व भ न रा
य सा ह य अपनी वल णता को बनाए रख सकगे।
रा
य सा ह य तथा तुलना मक सा ह य के अंतगत अ ययन के
क तपय वषय ऐसे ह जो रा
(क) व भ न सं कृ तय
य सा ह य के अ ययन के
के
अंतगत
को पार कर जाते है ः
का आपसी संब ध या टकराहट का सामा य अ ययन,
(ख)अनव
ु ाद से संबि धत सम याओं का
अ ययन
े
क तपय
मह वपण
ू
वशेष अ ययन,(ग) रा
वषय
ऐसे
है
य सा ह य के
िजनका
तल
ु ना मक
सा ह या ययन तथा शोधकाय म मह व कह ं अ धक है ।
Comparative Literature
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भौगो लक
ि ट से रा
य तथा तल
ु ना मक सा ह य म कोई
वभेदक रे खा खींचना मुि कल है ।पॉल वॉ टगहे म का कहना है क रा
का अ ययन मा
प ट
य सा ह य
एक ह सा ह य से संबि धत प्र न से अपना सरोकार रखता है
और तुलना मक सा ह य का अ ययन दो सा ह य
से जुडी हुई सम याओं का
व लेषण करता है । े ग दा द्रे यर ( )तो इस अंतर को और भी प ट प से प्रकट
करत ् हुए कहते है क रा य सा ह य क चारद वार के भीतर सा ह य का अ ययन
रा य सा ह य है और इस चारद वार के परे सा ह य का अ ययन तुलना मक
सा ह य है ।
का य का
भारतीय संदभ म हम कह सकते है क बंगला सा ह य म रवीं द्रनाथ के
थान नधारण के लए अ ययन सा
य सा ह य है परं तु उस पर कबीर,
शेल तथा उप नषद के प्रभाव का अ ययन तल
ु ना मक सा ह य है ।
व व सा ह य
उ नीसवीं शती म यूरोपीय
ि टकोण के आ य से जब व व
सा ह य
क अवधारणा का प्रसार हुआ तब इसक प र ध के अंतगत मा उसी सा ह य को
थान दया गया िजसका ज म यरू ोप म हुआ था।व तुतः व भ न यरू ोपीय भा षक
े
म वक सत होनेवाले सा ह य से संबि धत सा हि यक वधाएँ,आलोचना तथा
स ा त,सा हि यक आं दोलन या फर दो या तीन कृ तय या कृ तकार के व श ट
अ ययन को तल
ु ना मक सा ह य वीकारा गया।गोयते के ,वे ट लतरातरु ,का अथ भी
यह है ।इस प्रकार बीसवीं शती के प्रारं भ तक
व व सा ह य और वह भी यरू ोपीय
सा हय क प र ध के भीतर ह तुलना मक सा ह य अपने आपम सी मत रहा। बीसवीं
शती म व व सा ह य के अथ म एक
ाि तकार प रवतन आया।अब व व सा ह य
का ता पय है प ृ वी के कसी भी सा ह य का अ ययन अथात ् सा वक तर पर
सा ह य के इ तहास को ह व व सा ह य माना जाने लगा है ।आम तौर पर
तुलना मक सा ह य दो दे श
के सा ह य
या दो
व भ न रा
के लेखक
तुलना मक संब ध का अ ययन करता है । व व सा ह य का एक और अथ है
के
क
केवल दे श ह नह ं,काल, के संदभ म भी जो महान है अथात ् काल क कसौट म
िजसे
े ठ करार दया गया है संसार के
उस
े ठ सा ह य (Classics) को भी व व
सा ह य कहा जाता है .जैसे , डवाईन कॉमडी, डान कोहाटे , पैराडाइज लॉ ट,शकंु तला
कुमार संभव,आ द।
Comparative Literature
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क तपय तुलना मकतावाद आलोचक के अनस
ु ार अतीत क सा हि यक
कृ तय का, िज ह कालातीत प्र स
मल है , जब तुलना मक अ ययन होता है तब
उस अ ययन को तल
ु ना मक व व सा ह य कहना ठ क है ।गोयते ने यरू ोप क प र ध
को पार करके व व सा ह य के
तर पर व व सा ह य क अवधारणा को प्र ति ठत
कया।
भारतवष म रवीं द्रनाथ ठाकुर ने 1907 म तल
ु ना मक सा ह य के लए
, व वसा ह य ,श द का प्रयोग कया था।अपने एक भाषण म उ ह ने कहा था क
य द हम उस मनु य को समझना है िजसक अ भ यि त उसके कम ,प्रेरणाओं तथा
उ े य म होती है तो संपूण इ तहास के मा यम से हम उसके अ भप्राय से प र चत
होना है ।रवीं द्रनाथ ने इसे
प ट करते हुए आगे कहा है क िजस प्रकार यह व व
ज़मीन के टुकड का योगफल नह ं है उसी प्रकार सा ह य व भ न लेखक
वारा
र चत कृ तय का योगफल नह ं।रा यता क संक ण मनोविृ त से अपने को मु त
कर प्र येक कृ त को उसक संपण
इकाई म दे खना है और इस संपण
इकाई या
ू
ू
मनु य क शा वत सज
ृ नशीलता क पहचान व व सा ह य के वारा ह हो सकती है ।
इस प्रकार तुलना मक सा ह य और व व सा ह य म अंतर दखाई नह ं पडता।
रवीं द्रनाथ के अनस
ु ार तुलना मक सा ह य के अ ययन के
चलना होगा क व व क
य
लए हम यह मानकर
व भ न भाषाओं म र चत सा ह य एक संपूण इकाई
है
क असं य ऐ तहा सक तथा आ याि मक अंतसंब ध से र चत व व सा ह य म
इनक खोज और अ ययन ह तुलना मक सा ह य का काय है ।
सामा य सा ह य
सामा य सा ह य और तुलना मक सा ह य के अंतर को
प ट करते हुए
आर.ए.साइसी कहते है क कसी भा षक समाज क परवाह कए बना सा ह य का
अ ययन सामा य सा ह य है और पार प रक संब ध के आधार पर रा
का
अ ययन
का यशा
तुलना मक
सा ह य
है ।सामा य
सा ह य
अथवा सा ह य- स ा त का अ ययन।हॉ ट
का
प्रारं भक
स ा त अथवा का यशा
Comparative Literature
था,
स ा त
का
क
का अ ययन। तुलना मक सा ह य भी सा ह य
का अ ययन करता है मगर उसके अ ययन क प त
तुलना मक होती है । सामा य सा ह य इस प्रकार
करता।
अथ
च का भी कहना है
सामा य सा ह य से ता पय है सा हि यक प्रव ृ तय , सम याओं एवं
सामा य अ ययन अथवा स दयशा
य सा ह य
कसी प त का
नधारण नह ं
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वॉ
टगहे म के अनुसार तुलना मक सा ह य दो सा ह य
के आपसी
संब ध के अ ययन तक सी मत है ,जब क सामा य सा ह य का संब ध उन आंदोलन
और फैशन से है जो अनेक सा ह य से प्रभा वत दखाई पडते है ।रा
चारद वार के भीतर जो अ ययन है वह रा
य सा ह य क
य सा ह य है और इस चारद वार के परे
सा ह य का अ ययन तल
ु ना मक सा ह य है तथा द वार के ऊपर जो सा हि यक
अ ययन है वह सामा य सा ह य है ।
तुलना मक सा ह य का
े , भारतीय प रप्रे य
तथा भारतीय तुलना मक सा ह य
तुलना मक सा ह य क सवमा य
थल
ू प रभाषा यह हो सकती है
क यह
सा हि यक सम याओं का अ ययन है जहाँ एक से अ धक भाषाओं के सा ह य का
उपयोग कया जाता है ।
के अ ययन के दो
ा सीसी-जमन तथा अमर क
कूल के अनुसार इस प्रकार
प है ।एक म सा ह ये तहास को अ ययन का प्रमुख आधार माना
जाता है तथा दस
ू रे म कलापरक का यशा
ीय स दयमूलक तथा
व लेषणा मक
अंत ि ट के आ य से अ ययन का प्रसार होता है ।तल
ु ना मक सा ह य के
संप्रदाय ने पारं प रक
ा सीसी
प म न न ल खत वषय का अ ययन कया है ः
(क) वचार संप्रेषण क
व धयाँ
(ख)अ भ हण तथा प्रभाव
(ग)सा हि यक क य क
(घ) व भ न
वदे श-या ा
ोत
(ड़) कसी दे श के सा ह य म दस
ू रे दे श का च ण
र वनास ने तुलना मक सा ह य के बारे म कहा था क व भ न सा ह य के
अ यो य प्रभाव से यु त शोध ह तुलना मक सा ह य है -यह अंतरा
तथा सां कृ तक संब ध का अ ययन है । इन व वान क
प ट उभरकर कर सामने आते है ।एक, यह सामा य
अ ययन है तथा दो,पार प रक प्रभाव-सू
य सा हि यक
वचारधाराओं से दो त व
प से सा ह ये तहास का संपण
ू
का मू यांकन तल
ु ना मक सा ह य के
अ ययन का एक मह वपण
ू घटक है ।
Comparative Literature
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वकासवाद के आ य से सा ह य का अ ययन काफ
प्रामा णक है िजसे
पॉसनेट ने समझाते हुए कहा था क सा ह य को न चय ह प्रारं भ,पराका ठा तथा
पतन
क
ि थ तय
म
सा ह ये तहासवाद क
से
गज
ु रना
पडता
है ।सा हि यक
ि टय म सामा यतःअंतर बहुत ह कम है
तथा वकासवाद म अंतर वा त वक क अपे ा शा
ि ट के आधार पर इनके अंतर को
ि ट सा ह य म आ याि मक तथा मनोवै ा नक त व
क
य क इ तहासवाद
ीय
क वकासवाद क
खोज है ।आंदाल तथा
लए उनके ऐ तहा सक प रवेश को
जानना बहुत ह ज़ र है ।तुलना मक अ ययन म ए तहा सक
लए दो महायु
तथा
ीय अ धक है ।नगे द्र ने शा
प ट करते हुए लखा है
मीराबाई के अथपूण तल
ु ना मक अ ययन के
वकासवाद
के बीच का समय तुलना मक सा ह य का
ि ट के प धर के
वणयग
ु था।इस समय
कृ तय के सा हि यक संब ध का बहुत ह ठोस तथा नि चत उ लेख कया गया
और इनके समथन म सट क संदभगत प्रमाण दए गए।
अमर क
कूल
के
प्रभाव व प
तुलना मक
सा ह य
का
का यशा
ीय
स दयमूलक तथा कलापरक प रप्रे य काफ मह वपूण बनता चला जा रहा है । इस
अ ययन का उ े य यह है क कसी भी सा हि यक कृ त म न हत कलापरक
व प
को प्रकाश म लाना है ।
इन दोन संप्रदाय के आधार पर तल
ु ना मक सा ह य के अ ययन का
(1)पहला
े
है ,का यशा
एवं सा ह यालोचन तथा सा ह य म का यशा
ीय
स दयमूलक मू य का प्रयोग और उनका कलापरक व लेषण।
(2)दस
ू रे
े
म
सा हि यक
आंदोलन
का
अ ययन
मनोवै ा नक,बौ क या शैल वै ा नक प्रविृ तय का ववेचन होता है ।
(3)सा हि यक
वषय
के अ ययन का एक तीसरा
अ भ य त यि त व या अमूत वचार के व भ न
े
पां तर क
करते
हुए
है जहाँ सा ह य म
वभ न
ि टय से
प्रयोग का व लेषण होता है ।
(4)का य
प का अ ययन तुलना मक सा ह य म ,म ृ य,ु पर दए गए वचार
को अमूत वचार से जड
ु ा हुआ वषय कहा जा सकता है ।
Comparative Literature
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(5)सा हि यक संब ध का अ ययन तुलना मक सा ह य का पाँचवाँ
जॉन
के
े
े
है ।
लेचर ने अपने नब ध ,The criticism of comparison, तुलना मक सा ह य
को नधा रत करते हुए लखा है क इसके अंतगत न न ल खत वषय- े
सि म लत कए जा सकते है ः
(क)सां कृ तक दे शां तरण का वशेष अ यय।
(ख) व भ न लेखक के पार प रक प्रभाव का ववेचन।
(ग)अनव
ु ाद और गलत अनुवाद का ववेचन।
(घ)सा ह य तथा दस
ू र कलाओं के पार प रक प्रभाव का ववेचन।
ांकाय जॉ ट (Francois Jost) ने तुलना मक सा ह य के
े
क चार को टयाँ
बनाई ह।उनके अनस
ु ार यह व यानश
ु ासन चार-आयामी अनुशासन है ।
(1)
प्रथम को ट के अंतगत उन कृ तय
जैवीय सा
(2)
दस
ू र
यता मौजूद है ।
को ट के अंतगत आंदोलन
का तुलना मक अ ययन अपे
तथा प्रविृ तय
त है िजनम
जैसे भि तकाल, व छदतावाद,
नवजागरण, यथाथवाद,नई कता आ द का अ ययन शा मल है ।
(3)
तीसर को ट के अंतगत सा हि यक कृ तय क आं रक तथा बा य संरचना तथा उनके
का य प का व लेषण होता है ।
(4)
चौथी को ट के अंतगत सा हि यक वषयव तु (themes)तथा अ भप्राय (motifs) का
व लेषण अपे
त है ।
इन चार को टय
का यशा
के अ त र त एक पाँचवीं को च भी है (5)
स ा त-अ भमख
ु ी
तथा कृ त-अ भमुखी सा ह यालोचन का अ ययन।
भारतीय प रप्रे य
भारतीय या सं कृत का यशा
म सा ह य का अथ है , श द और अथ का
सहभाव।श द और अथ का यह सहभाव वशेष प्रकार का सहभाव है िजससे का यभाषा
का यह
व श ट स दय प्रकट होता है जो उसे सामा य भाषा से अलग करता
है ।कंु तक का कहना है , व श टम इव सा हि यम ् अ भप्रेतम,।इस , वशेष, के
नधा रत करना एवं सा ह य म यह कैसे प्रकट होता है इसका
का यशा
प को
ववेचन करना ह
क मूल सम या है ।
Comparative Literature
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कसी एक कृ त के मू यांकन लए यह आव यक है क आलोचक अपने को
क व क ि थ त प्र तुत कर अथवा उसके
ि टकोण को
हण कर।अगर क व सज
ृ न
करता है तो आलोचक उसका पन
ु ःसज
ृ न करता है और चँू क मू यांकनपरक
पन
ु ःसज
ृ ना मक होती है ,इस लए वह अ नवाय
होती है ।इनम अंतर प रि थ तय क असा
सा ह य
न चया मक एवं आलोचना
सं कृत का यशा
प से सज
ृ ना मक
यता पर
या
या के सम प
नभर है
य क सज
ृ ना मक
हणशील होती है ।इसी को सामझाने के लए
म यह कहा गया है
क सज
ृ नशील अंत चेतना प्र तभा है और
पुनः सज
ृ ना मक प्र तभा ह आ वाद है ।जो आ वाद करता है वह स दय है ।अ भनव
गु त ने यह
प ट कहा था
क भाषा (सं कृत) एवं शा
ीय
ान के अ त र त
स दय म वह शि त अव य होनी चा हए िजसक सहायता से वह का या मक सज
ृ न
के साथ अपना तादा
य कर सके।
सं कृत का यशा
क
सबसे बडी
यूनता यह
रह
है
क इनसे क व
यि त व के व लेषण के प्र त संपूण न चे टता दखाई िजसके फल व प इसका
का यशा
ीय स दयपरक शा
के
प म सवतोमुखी वकास नह ं हो सका।व तुतः
क व क व- यि त व से ह कृ त अपना व श ट
है ।वॉ
चर
प्रा त करती
टगहे म के अनस
ु ार तल
ु ना मक सा ह य के अ ययन म क व
यि त व क
सज
ृ ना मक
प या
वतं
याओं तथा प्रभाव का ववेचन होता है ।इस प्रकार सं कृत का यशा
तल
ु ना मक आलोचना को नकारता है जहाँ कोई एक कृ त बस
ू र कृ त से
है अथवा
य
भ न
य एक ह लेखक क दो कृ तय म व भ नता आ जाती है आ द का
ववेचन होता है ।इसी के फल व प भारत म सं कृत का यशा
के आ य से
तुलना मक सा ह य के अ ययन का वकास नह ं हो सका।
भारतीय तुलना मक सा ह य
सं कृत के सज
ृ नशील कृ तकार ने दे शी भाषा म ल खत सा ह य के प्र त कोई
च नह ं दखलाई और इसी लए इस सा ह य क सं कृत पटभू मका को लेकर कोई
रचना उपल ध नह ं है ।हमार आधु नक भाषाओं के उ व के साथ-साथ इस दशा म
तुलना मक अ ययन क संभावनाएँ दखाई पडी मगर फर भी
Comparative Literature
ा मणवाद से जुडे हुए
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हमारे सं कृत पां ड य ने इस ओर कोई कदम नह ं बढाया।अं ेजी सा ह य के संपक म
आने पर ह भारत म सा ह य के प्र त तुलना मक
ि ट का वा त वक प्रसार हो सका
और इस काय म अं ेजी के मा यम से दस
ू रे यरू ोपीय सा ह य से भी हम प र चत हो
सके।
यह नि चत है क अं ेजी सा ह य के प्र त हमारे आ ह के फल व प हमार
सा हि यक
ि ट का वकास हुआ और हमने एक बह
ृ तर प रप्रे य म सा ह य को
हण करने क को शश क ।हमारे आधु नक सा ह यकार
ने पा चा य सा ह य के
संदभ म आधु नक भारतीय सा ह य के वकास क बात क और इस तरह तुलना मक
ि टकोण का प्रसार कया।बंगाल के व यात क व माइ कल मधस
ु ूदन द त,(18241873) ने एक ऐसे समि वत सा ह य-जगत क क पना क थी िजसम यूरोप तथा
भारत के क य को एक ह मंच पर
थान
दया गया था।भारत म पहल
दफा
तुलना मक आलोचना के नई मॉडल का संकेत दे नेवाले माइकेल ह थे।
सन ् 1859 म मै सनल
ू र
वारा र चत ,ए
लटरे चर, म सां कृ तक इ तहास क
ह टर
ऑफ एनश ट सं कृत
ि ट से सं कृत तथा यन
ू ानी सा ह य के
इ तहास के अ ययन क बात कह गयी है और दोन के
ि टकोण को
मशः नविृ त
और प्रविृ त मल
ू क कहा गया है ।म ययग
ु ीन भारतीय सा ह य के अ ययन म यरू ोपीय
व वान
ने सह
मायने म भारतीय भाषाओं के
व भ न सा ह य
के आ य से
तल
ु ना मक प त का प रचय दया था।
चा स.ई. ोवर ने अपनी पु तक ,द फॉक सो स ऑफ सदन इं डया,(1871) म
त मल सा ह य के साथ-साथ क नड,तेलुगु,मलयालम तथा कूग भाषाओं म र चत
गीत का उ लेख करते हुए इ ह एक ह वग क क वता प्रमा णत कया है ।इस प्रकार
के आलोचना मक
यह कहते है
े मवक के आधार पर जी.य.ू पोप कुरल के अनुवाद क भू मका म
क त मल क वता म छोटे छोटे
साथ यन
ू ानी सूि तब
प रवेश म ये क वताएँ
क वताओं क
तता के
वषय व तु, अनुभू त तथा िजस सामािजक
लखी गयी है उस प रवेश क तुलना क जा सकती है ।
त वाचकम ् तथा नाल डयार, के अनव
ु ाद क
Comparative Literature
लोक क सूि तनूमा सं
भू मका म वे त मल भाषा भाषी
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व वान से यह आ ह करते है क त मल क क वताओं क वा त वक आ वाद के
लए अं ेजी म ल खत धा मक क वताओं से प र चत होना ज र है
य क कोई भी
सा ह य अपने-आप अलग खडा नह ं हो सकता।व तत
ु ः1908 म कह गयी इस प्रकार
क उि तय से ह भारतीय तल
ु ना मक सा ह य क बु नयाद तैयार हुई थी।इस बीच
भारतीय व व व यालय क
थापना के साथ साथ इस शताि द के तीसरे दशक से
भारतीय भाषाओं के सा ह य से संब ध शोधकाय म तल
ु ना मक सा ह य प त क
और भारतीय व वान का
यान आक षत हुआ और प्रयरं जन सेन जैसे व वान का
,इन लुए स ऑफ वे टे न लटरे चर इन द डेवेलेपमे ट ऑफ बंगाल नॉव स,(1932)
जैसी तल
ु ना मक शोध क पु तक प्रका शत होने लगीं।
दरअसल तुलना मक सा ह य क आलोचना मक प त से अप र चत रहने के
कारण अ धकतर भारतीय व वान इसके वा त वक
प को उभारने म असमथ रहे ह
फर भी इस दशा म बु दे व बोस,नरे श गुहा,नगे द्र, आर.के.दास गु ता,बी.आलफॉ से
कारकल,बी.के.गोकाक,डा.हरभजन
अ य कार,सी.ट .नर स माह,सुिजत
संह,
एडवड.सी. डमॉक,जी.नोल ,के.आर
मुखज , श शर
दास,नवनीता
ी नवास
दे वसेन,
फादर
आंतोया,अ मयदे व,इ द्रनाथ चौधरु आ द व वान का काय सराहनीय रहा है ।
आज तुलना मक सा ह य का प्रसार प्रचार पि चम से कह ं अ धक भारत म
दखाइ पडता है ।भारत का बहुभा षक दे श होना इसका एक बहुत बडा कारण है ।इसके
अ त र त उ तर आधु नक यग
ु म अपनी भाषा के प्र त हरे क क सचेतनता का प्रसार
होने से
सा ह य
व भ न भाषाओं के सा ह य को
े
व तार
मला है ।भारत एक तुलना मक
है और सा ह य के अ ययन का तुलना मक होना भारत म एक
वाभा वक प्रविृ त है ।उ तर आधु नक दे सीवाद से जड
ु ी सचेतनता के
व तार के
फल व प भारत के व भ न व व व यालय के अं ेजी वभाग म भी तुलना मक
सा ह य प त के आ य से भारतीय सा ह य के अ ययन अ यापन को बल मला
है ।
Comparative Literature
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जवाब ल खए1. रा
रा
य सा ह य का अथ
या है ।
य सा ह य तुलना मक सा ह य क
उन इकाइय
का संकेत दे ता है िजनक
सहायता से तुलना मक सा ह यानश
ु ासन क बु नयाद तैयार होती है ।
2. तल
ु ना मक सा ह य के संब ध म आर.ए साइसी का वचार
प ट क िजए।
आर.ए साइसी ने तुलना मक सा ह य क प रभाषा दे ते हुए कहा था क तल
ु ना मक
सा ह य व भ न रा
य सा ह य का एक-दस
ू रे के आ य से तल
ु ना मक संब ध का
अ ययन है ।
3.
व वसा ह य (Welt Literatur)के संब ध गोयते का वचार
गोयते ने व वसा ह य (Welt Literatur)के संदभ म रा
या है ।
य सा ह य क ि थ त को
प ट करते हुए कहा है क वे ट लतरातुर अपनी सा हि यक परं पराओं का बोध है ।
इस तरह व भ न रा
4. रा
एक-दस
ू रे को पहचान या समझ सकते ह
य तथा तुलना मक सा ह य के अंतर को य त क िजए।
भौगो लक
ि ट से रा
य तथा तल
ु ना मक सा ह य म कोई
खींचना मुि कल है ।पॉल वॉ टगहे म का कहना है क रा
मा
प ट
वभेदक रे खा
य सा ह य का अ ययन
एक ह सा ह य से संबि धत प्र न से अपना सरोकार रखता है और तुलना मक
सा ह य का अ ययन दो सा ह य से जड
ु ी हुई सम याओं का व लेषण करता है । े ग
दा द्रे यर ( )तो इस अंतर को और भी
रा
प ट
प से प्रकट करत ् हुए कहते है क
य सा ह य क चारद वार के भीतर सा ह य का अ ययन रा
य सा ह य है और
इस चारद वार के परे सा ह य का अ ययन तुलना मक सा ह य है ।
5.
व व सा ह य का ता पय
या है ।
अब व व सा ह य का ता पय है प ृ वी के कसी भी सा ह य का अ ययन अथात ्
सा वक
तर पर सा ह य के इ तहास को ह
व व सा ह य माना जाने लगा है । व व
सा ह य का एक और अथ है क केवल दे श ह नह ं ,काल , के संदभ म भी जो
महान है अथात ् काल क कसौट म िजसे
े ठ करार दया गया है संसार के उस
े ठ सा ह य (Classics) को भी व व सा ह य कहा जाता है
Comparative Literature
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6. रवीं द्रनाथ के अनस
ु ार तुलना मक सा ह य का काय
या है ।
रवीं द्रनाथ के अनस
ु ार तुलना मक सा ह य के अ ययन के
चलना होगा क व व क
य
लए हम यह मानकर
व भ न भाषाओं म र चत सा ह य एक संपण
ू इकाई
है
क असं य ऐ तहा सक तथा आ याि मक अंतसंब ध से र चत व व सा ह य म
इनक खोज और अ ययन ह तुलना मक सा ह य का काय है ।
7. व वसा ह य के बारे म
रवीं द्रनाथ ठाकुर क
ि टकोण को य त क िजए।
भारतवष म रवीं द्रनाथ ठाकुर ने 1907 म तुलना मक सा ह य के लए , व वसा ह य
,श द का प्रयोग कया था।अपने एक भाषण म उ ह ने कहा था क य द हम उस
मनु य को समझना है िजसक अ भ यि त उसके कम ,प्रेरणाओं तथा उ े य म होती
है तो संपण
इ तहास के मा यम से हम उसके अ भप्राय
ू
है ।रवीं द्रनाथ ने इसे
के टुकड
से प र चत होना
प ट करते हुए आगे कहा है क िजस प्रकार यह व व ज़मीन
का योगफल नह ं है उसी प्रकार सा ह य
कृ तय का योगफल नह ं।रा
व भ न लेखक
वारा र चत
यता क संक ण मनोविृ त से अपने को मु त कर
प्र येक कृ त को उसक संपण
ू इकाई म दे खना है और इस संपण
ू इकाई या मनु य क
शा वत सज
ृ नशीलता क पहचान व व सा ह य के
वारा ह हो सकती है । इस प्रकार
तुलना मक सा ह य और व व सा ह य म अंतर दखाई नह ं पडता।
8. सामा य सा ह य के संब ध म
आर.ए.साइसी का वचार
सामा य सा ह य और तुलना मक सा ह य के अंतर को
कहते है
क
कसी भा षक समाज क
परवाह
सामा य सा ह य है और पार प रक संब ध
अ ययन तुलना मक सा ह य है ।
9. सामा य सा ह य का प्रारं भक अथ
कए
या है ।
प ट करते हुए आर.ए.साइसी
बना सा ह य का अ ययन
के आधार पर रा
य सा ह य
का
या था।
सामा य सा ह य का प्रारं भक अथ था, का यशा
अथवा सा ह य- स ा त का
अ ययन।
10. तुलना मक सा ह य व सामा य सा ह य के बारे म वॉ टगहे म क राय
वॉ
टगहे म के अनुसार तुलना मक सा ह य दो सा ह य
या है ।
के आपसी संब ध
अ ययन तक सी मत है ,जब क सामा य सा ह य का संब ध उन आंदोलन
के
और
फैशन से है जो अनेक सा ह य से प्रभा वत दखाई पडते है ।
Comparative Literature
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11. तुलना मक सा ह य के
ा सीसी संप्रदाय ने पारं प रक
प म
कन
वषय
का
अ ययन कया है ।
तल
ु ना मक सा ह य के
ा सीसी संप्रदाय ने पारं प रक
प म न न ल खत वषय का
अ ययन कया है ।
(क)
वचार संप्रेषण क
व धयाँ
(ख)
अ भ हण तथा प्रभाव
(ग)
सा हि यक क य क
वदे श-या ा
(घ)
वभ न
ोत
(ड़)
कसी दे श के सा ह य म दस
ू रे दे श का च ण
12. तुलना मक सा ह य के बारे म र वनास क राय ल खए।
र वनास ने तुलना मक सा ह य के बारे म कहा था क व भ न सा ह य के अ यो य
प्रभाव से यु त शोध ह तुलना मक सा ह य है ।
13. तुलना मक सा ह य के
जॉन
े
े
को नधा रत करते हुए जॉन
लेचर क राय
या है ।
लेचर ने अपने नब ध ,The criticism of comparison, तल
ु ना मक सा ह य के
को
नधा रत करते हुए
लखा है
क इसके अंतगत
न न ल खत
वषय- े
सि म लत कए जा सकते है ः
(क)
(ख)
14.
सां कृ तक दे शां तरण का वशेष अ यय।
व भ न लेखक के पार प रक प्रभाव का ववेचन।
(ग)
अनुवाद और गलत अनुवाद का ववेचन।
(घ)
सा ह य तथा दस
ू र कलाओं के पार प रक प्रभाव का ववेचन।
ांकाय जॉ ट (Francois Jost) ने तुलना मक सा ह य के
े
क
कतनी को टयाँ
बनाई ह। कौन-कौन सी ह।
ांकाय जॉ ट (Francois Jost) ने तुलना मक सा ह य के
े
क चार को टयाँ बनाई
ह।उनके अनुसार यह व यानश
ु ासन चार-आयामी अनश
ु ासन है ।
(1)
प्रथम को ट के अंतगत उन कृ तय का तुलना मक अ ययन अपे
जैवीय सा
Comparative Literature
त है िजनम
यता मौजूद है ।
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(2)
दस
ू र को ट के अंतगत आंदोलन तथा प्रविृ तय जैसे भि तकाल, व छदतावाद,
नवजागरण, यथाथवाद,नई कता आ द का अ ययन शा मल है ।
(3)
तीसर को ट के अंतगत सा हि यक कृ तय क आं रक तथा बा य संरचना तथा
उनके का य प का व लेषण होता है ।
(4)
चौथी को ट के अंतगत सा हि यक वषयव तु (themes)तथा अ भप्राय (motifs)
का व लेषण अपे
त है ।
15. भारतीय या सं कृत का यशा
म सा ह य का अथ
या है , श द और अथ का
सहभाव।
भारतीय या सं कृत का यशा
16. भारत म सं कृत का यशा
वकास नह ं हो सका –
सं कृत का यशा
कृ त से
य
म सा ह य का अथ
है , श द और अथ का सहभाव।
के आ य से तुलना मक सा ह य के अ ययन का
प ट क िजए।
तुलना मक आलोचना को नकारता है जहाँ कोई एक कृ त बूसर
भ न है अथवा
य एक ह लेखक क दो कृ तय म व भ नता आ
जाती है आ द का ववेचन होता है ।इसी के फल व प भारत म सं कृत का यशा
के
आ य से तल
ु ना मक सा ह य के अ ययन का वकास नह ं हो सका।
Comparative Literature
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UNIT –3
तुलना मक सा ह य म अनव
ु ाद क भू मका
तुलना मक सा ह य का मूल उ े य एक व तत
ृ प रप्रे य म सा ह य का
अ ययन करना है िजससे
क उसका उ चत अ भ ान या रसा वादन हो सके।
इसके लए आव यक है क इस अ ययन म एक से अ धक सा ह य को सि म लत
कया जाए, वशेष
प म उन सा ह य को जो रा
य प र ध के बाहर वक सत हो
रहे ह। अतः व भ न भाषाओं के अनेक सा ह य का व तत
ृ
ान इस अ ययनके
लए ज र है । भारत म तल
ु ना मक सा ह य के अ ययन के दो मह वपण
ू उ े य है ः
1.एकक यव था
तर पर एकल सा ह य के
प म भारतीय सा ह य के
इ तहास क अवधारणा का नमाण बहुत ह ज र है ।भारतीय सा ह य के इ तहास से
ता पय है ,वै दक, सं कृत, पाल ,प्राकृत,आ द सा ह य के साथ उद ू तथा आधु नक
प्रा तीय भाषाओं म र चत सा ह य। इनके अंतगत भारतीय के
वारा र चत अं ेजी
सा ह य को भी सि म लत
के
सा ह य के वशाल
आलोचना मक
वारा भारतीय
प का नमाण हुआ है ।वतमान समय म व तत
ृ तुलना मक एवं
तर पर
है ।एकक सा ह य के
कया जाता है ।इन सब सा ह य
व भ न प्रांतीय भाषाओं के सा ह य का अ ययन हो रहा
प म भारतीय सा ह य क
अवधारणा
नमाण तुलना मक
सा ह य के अ ययन के आ य से ह पूरा कया जा सकता है ।
2.भारतवष म तुलना मक सा हय के अ ययन का दस
ू रा उ
य है ,
पा चा य सा ह य के बारे म एक समु चत वचारधारा का वकास।भारत म सवा धक
प्रच लत वदे शी भाषा होने के कारण भारतीय व याथ पा चा य सा ह य को मा
अं ेजी या इंगलड के मा यम से जान पाता है ।पर इससे मिु त पाने के लए एकमा
उपाय यह है
क अं ेजी के अ त र त दस
ू र
सा ह य का अ ययन-अ यापन
वदे शी भाषाओं म र चत पा चा य
कया जाए।इसके लए तुलना मक सा ह य ह काम
आता है ।
Comparative Literature
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इस प्रकार हम कह सकते है
क इन उ े य
क
प्राि त के
लए
तुलना मक सा ह य के अंतगत नाना भाषाओं म र चत सा ह या ययन एवं उससे
संब ध अनव
ु ाद का मह वपण
ू योगदान है । तल
ु ना मक सा ह य के अ ययन के लए
बहुत सी भाषाओं को पढना कोई आसान काम नह ं है इस लए अनव
ु ाद के मा यम से
सा ह य का अ ययन हम कर सकते ह।पर कुछ लोग यह मानते ह क अनव
ु ाद के
मा यम से सा ह या ययन असंभव है ।पर यह पण
ू
प से ठ क भी नह ं है । य क
तुलना मक सा ह य के अ ययन म दो भाषाओं के
ान के अ त र त सा ह य के
वभ न प
के व लेषण के लए व भ न दे श क भाषाओं म कए गए अनव
ु ाद
क ज रत है ।
बलहॉम वॉन हमबॉ ट ने अनव
ु ाद काय को सा ह य के लए आव यक
माना है ।इससे एक दे श के रहनेवाले दस
ू रे दे श क कला और मानवता से प रचय होते
है तथा कोई एक भाषा-भाषी वग अथ और अ भ यि त के नए प्रयोग से प र चत
होकर अपने
ान के
तज का व तार कर पाता है ।बांगला के प्र स
उप यासकार
शरतच द्र के उप यास के अनव
ु ाद भारत के दस
ू रे प्रा त म इस प्रकार से दे शीकृत हो
चक
ु े ह
क उ तर प्रदे श, गज
ु रात, आं
उप यासकार
का यानव
ु ाद
माननेवास
क
सं या
, आ द प्रा त
अभी
भी
काफ
म उ ह उसी भाषा का
है ।रवीं द्रनाथ
ठाकुर
के
से तीसरे तथा चौथे दशक के भारत के संदभ म,अनव
ु ाद कला से
प र चत होना नतांत आव यक है ।
अनुवाद का प्रभाव लेखक क सज
ृ न प्र
या पर पडता है ।बालजाक के
Engenie Grandet के अनव
ु ाद को पढकर ह द तोव क ने अपना सा हि यक जीवन
शु
कया ता।आथर वेले क चीनी तथा जापानी क वताओं के अनुवाद को पढकर ह
े ट क का य संवेदना का व तार हुआ था।अनुवाद सा हि यक आंदोलन और का य
प
को भी प्रभा वत करता है ।नौवा लस ने
लेगल को
लखे एक प
म जमन
रोमां टक आंदोलन के प्रसार म अनुवाद क भू मका का व तार से ववेचन कया है ।
कैटफोड के अनुसार अनुवाद का मतलब है – ोतभाषा क पाठ-साम ी को
ल यभाषा क समानांतर पाठ-साम ी से प्र त थापन ह अनव
ु ाद है ।कैटफोड ने अनुवाद
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क इस प रभाषा को प्र तुत करते हुए आगे चलकर,यह कहा है क प्र त थापन का
अथ
थानांतरण नह ं
य क
थानांतरण म प्र त ठापन क भावना
है ।प्र त थापन का वा त वक अथ है ,
ल यभाषा
ोत भाषा के
याकरण और श द भंडार का
के
याकरण
और
श द-भंडार
से
प रणाम व प
ोतभाषा
क
वनप्र
और, ाफोलॉजी
वनप्र
या और
मान के
तथा
या
न हत रहती
प्र त थापन
करना
का
तथा
इसके
ल यभाषा
क
ाफोलॉजी से प्र त थापन होता है ।यहाँ प्र त थापन का अथ तु य
वारा प्र त थापन नह ं है । य क भाषा का
याकरण,श द-भंडार, वनप्र
ाफोलॉजी आ द एक सं कृ त का पैटन के आ य से
या
वक सत होती है जो
जा त,प रवेश तथा समय के
वारा प्रभा वत होता है इस लए अनुवाद तु यमान का
प्र त थापन नह ं। वषय एवं
ोत तथा ल य भाषाओं के
ान के आधार पर अथ को
दयंगम करके उसे ल यभाषा म डालने एवं उसके लए कोशगत संब ध के साथ-साथ
संदभगत संब ध का पता लगने पर ह सह अथ या संदभगत अथ का पता लग
पाता है ।
अनुवाद सज
ृ न नह ं, मा
अनक
ु रण है - इस धारणा को लेकर पता नह ं
कतने यग
से व वान म मतभेद चलता आ रहा है ।हे नर
ु
सा ह य एक सज
ृ ना मक
सफेद-काले म पन
ु
या है मगर अनव
ु ाद तैल च
गफोड का कहना क
के समान उस सज
ृ न का
पादन के सवाय और कुछ नह ं।दरअसल यह बात
िजस समय क व-क पना अपनी परू साम य के साथ काम करती है
वीकाय है क
क कोई भी
अनुवाद उस सज
ु ादक के सामने दो समीकरण होते
ृ न क बराबर नह ं कर सकता।अनव
है िजनम से उसे अनुवाद –काय के लए एक को चन
ु ना पडता है ।पहला समीकरण है ःकख=मूल के अ धक
नकट।यहाँ क से ता पय है मूल कृ त और ख से ता पय है
अनुवाद करते हुए मूल के जो त व लोप हो जाते ह।यह समीकरण मूल के अ धक
नकट होता है ।दस
ू रा समीकरण है ःक-ख+ग=मूल से दरू ।यहाँ ग से ता पय है अनुवाद
करते हुए मूल म जो त व अनव
ु ाद के
ु ादक क ओर से संयोिजत होते ह।सा ह यानव
लए दस
ू रा और वै ा नक अनुवाद के लए पहला समीकरण अपे
त है । अनुवादक का
काम न तो सज
ु ादक कभी-कभी
ृ ना मक है और नह ं वह अनुकरणा मक कला है ।अनव
Comparative Literature
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इस त य से अप र चत रह जाते ह
है ।यह एक सज
ृ ना मक प्र
क अनुवाद-काय
या है िजसके
या या- व लेषण का काय
वारा अनव
ु ादक को लेखक क द ु नया को
फर से जीना होता है ।
मल
ू लेखक और अनव
ु ादक म अंतर के दो कारण है ः एक, अनव
ु ादक का
अ भ यि त का अपना ह
ढं ग होता है , उसको शैल
यि त व और यग
ु बोध पर आ
वधान ल यभाषा के
अपनी होती है जो उसके
त होती है । दस
ू रा, ोतभाषा म
प और अथ का
प और अथ के अनु प हो सकता है मगर वह कभी भी एक
समान नह ं होता। मगर अनुवाद करते हुए को शश यह होनी चा हए क ल यभाषा म
एक ओर मूल का
वाद बरकरार रहे और दस
ू र ओर अनुवाद सुगमता और आनंद से
पढा जाए।मगर अनुवादक के यि त व तथा यग
ु बोध के कारण उसक भाषा के प्रयोग
म वैचा रक,जा तगत, तथा भा षक शि तय
का प्रभाव उभर आता है िजसके
फल व प व भ न अनुवाद म हम व भ न आ वाद प्रा त होते ह।
अनुवादक मूलतः
ोतभाषा क
मूल संरचना को ल यभाषा क
मूल
संरचना म बदलता है ।इस काय म उसे अनुवाद के पाँच सोपान का प्रयोग करना
पडता है ः(क)
ोत तथा ल यभाषा का
ान (ख) पाठ या वषय का परू ा प रचय, (ग)
व लेषण (घ) प्र त थापन, तथा (ङ)अनव
ु ाद क सहायता से पाठ का संरचना मक
पन
ु ः नमाण।इस
जवाब ल खएः
1. अनुवादक के सामने दो समीकरण होते है िजनम से उसे अनुवाद –काय के लए एक
को चन
ु ना पडता है ।वे समीकरण कौनसी है ।
अनुवादक के सामने दो समीकरण होते है िजनम से उसे अनुवाद –काय
के लए एक को चन
ु ना पडता है ।पहला समीकरण है ःक-ख=मूल के अ धक नकट।यहाँ
क से ता पय है मूल कृ त और ख से ता पय है अनव
ु ाद करते हुए मूल के जो त व
लोप हो जाते ह।यह समीकरण मूल के अ धक नकट होता है ।दस
ू रा समीकरण है ःक-
ख+ग=मूल से दरू ।यहाँ ग से ता पय है अनुवाद करते हुए मूल म जो त व अनुवादक
क ओर से संयोिजत होते ह।
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2. मूल लेखक और अनुवादक म अंतर के कारण
या है ः
मूल लेखक और अनुवादक म अंतर के दो कारण है ः एक, अनुवादक का
अ भ यि त का अपना ह
ढं ग होता है , उसको शैल
यि त व और यग
ु बोध पर आ
वधान ल यभाषा के
अपनी होती है जो उसके
त होती है । दस
ू रा, ोतभाषा म
प और अथ का
प और अथ के अनु प हो सकता है मगर वह कभी भी एक
समान नह ं होता।
3. अनुवाद के पाँच सोपान
या है ।
अनुवाद के पाँच सोपान ह (क)
या
वषय का पूरा प रचय, (ग)
ोत तथा ल यभाषा का
ान (ख) पाठ
व लेषण (घ) प्र त थापन, तथा (ङ)अनुवाद क
सहायता से पाठ का संरचना मक पुनः नमाण।
4. कैटफोड के अनुसार अनुवाद का मतलब
या है ।
कैटफोड के अनुसार अनुवाद का मतलब है – ोतभाषा क पाठ-साम ी को
ल यभाषा क समानांतर पाठ-साम ी से प्र त थापन ह अनुवाद है ।
5.
बलहॉम वॉन हमबॉ ट ने अनुवाद काय को सा ह य के
लए आव यक माना
है । य ।
बलहॉम वॉन हमबॉ ट ने अनव
ु ाद काय को सा ह य के लए आव यक
माना है । य
क इससे एक दे श के रहनेवाले दस
ू रे दे श क कला और मानवता से
प रचय होते है तथा कोई एक भाषा-भाषी वग अथ और अ भ यि त के नए प्रयोग से
प र चत होकर अपने
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ान के
तज का व तार कर पाता है ।
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UNIT -4
ह द और मलयालम
म तुलना मक सा ह य
आधु नक भारत के इ तहास म उ नीसवीं शताि द पन
ु जागरण का
प्र तफलन है । राजा राममोहनराय, मह ष दयान द सर वती, रामकृ ण परमहं स,
केशवच द्र सेन,
वा म ववेकान द, आ द वचारक और साधक ने भारत के जन-
मानस म िजस उ थानमल
ू क आ दोलन को ज म दया था वह उ नीसवीं शताि द म
यापक
तर पर फैलता गया था। धा मक और सामािजक सुधारवाद
भू मका से
बढकर वह पहले अतीत गौरव का के द्र बना, तदन तर नै तक मू य
आ थावान होता गया। इसी
भावना
वदे श प्रेम के
म म राजनी तक चेतना का उदय हुआ।रा
के प्र त
यता
क
प म प्र फु टत हुई।इस नवीन उ मेष को वाणी दे ने और जन
साधारण तक पहूँचने का दा य व भारत के सा ह यकार ने वहन
कया।भारत क
प्र येक भाषा म बीसवीं शती म ऐसे क वय और लेखक का ज म हुआ िज ह ने
अपनी अपनी भाषाओं म सु दर तथा
े ठ रचनाएं प्र तत
ु करना प्रारं भ कया।भारत
क प्रायः सभी भाषाओं म बडे-बडे प्र तभावान, स म
क वय
क
एवं
े ठ क व उ प न हुए।इन
ि ट सुधार परक नै तक जागरण से आगे बढकर समाज, जगत ्,
प्रकृ त,अ या म,दशन, राजनी त आ द व वध वषय पर गई और उ ह ने क वता को
जगत ् और जीवन के यापक
तज तक या त कर दया।
ह द सा ह य के इ तहास म बीसवीं शती के दस
ू रे दशक म एक नयी
शैल क क वता का सू पात हुआ। यह क वता सपाट बयानी से हटकर ला
णकता
और आदश क नै तक श दावल को छोडकर रह य, अ या म, प्रेम प्रकृ त मनोजगत ्
और सौ दयवणन को लेकर चल थी।जगत ् के
यमान पदाथ पर अ या मपरक
ि ट से चेतन स ता का आरोप कर वणन करना इस शैल क क वता म प्रमुख हो
गया था।रोमांि टक का यप्रविृ तयां भी इस का य म
या त थी।फलतः इस शैल क
क वता का नाम ह द म छायावाद हो गया।इस शैल क प्रमुख क वय म प्रसाद,पंत,
नराला और महादे वी का नाम आता है ।इन क वय म
प्रेमी,सौ दय प्रेमी,अ या म प्रेमी के
ी सु म ानंदन पंत प्रकृ त
प म व यात ह।उ ह ने छायावाद को प्र ति ठत
करने म सवा धक योग दया।
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पंत और जी शंकर कु प
सु म ानंदन पंत का ज म हमालय के अ मोङा िज ले के कौसानी
ाम
म हुआ था।पंत जी क पहल क वता गरजे का घंटा सन ् 1916 क रचना है । तब से
ंथ ह –उ
वास, ं थ, वीणा,
वण करण,
वणधू ल, उ तरा,
रजत शखर, वाणी, पतझर आ द। चदं बरा पर 1968 म भारतीय
ानपीठ परु कार
वे
नरं तर का य साधना म त ल न ह।उनके का य
चदं बरा,प लव, और गंुजन, यग
ु ांत, यग
ु वाणी,
ा या,
उ ह प्रा त ह।
पंत जी क का य म प्रकृ त के मनोरम
मलता है । पंतजी क क वता ह द सा ह य म ला
नदशन है ।पि चम म स बो ल म नाम से क वता के
चला था।रोमाि ट स म और स बो ल म दोन शै लय
प का मधरु और सरस च ण
णकता एवं
े
े ठ
म एक शैल गत आ दोलन
के स तु लत समाहार से जो
रोमानी शैल पंत जी ने ह द क वता को द वह ल णा एवं
अ यंत सम ृ
यंजकता क
यंजना के योग से
तथा आकषक बन गयी है ।
गो व द शंकर कु प या जी शंकर कु प
मलयालम भाषा के प्र स
कव
ह। उनका ज म केरल म हुआ था। महाक व का लदास क क वताओं से प्रभा वत
होकर वे का य के
े
म आये। अ यापन काय के साथ-साथ अं ेजी भाषा
तथा सा ह य का अ ययन
ानपीठ परु कार
कया। उनक
प्र स
वारा स मा नत हुइ है ।
सा ह य
कौतुकम ्
,सूयकां त
वनगायकन ् ,इतलुकल ् ,ओट कुषल, प थकंटे
,जीवन संगीतम ् ,मू न वयम
ु ् ओ
वे ल चि तंटे दत
ू म ्, सा
रचना ओट कुषल अथात बाँसुर
, न मषम ्,
चक त कल ्
पा ु , वेि ल
परवकल ्,
मु तुकल ्,
व वदशनम ्
पु यम
ु ् ,पाथेयम ् , ,मधरु म ् सौ यम ् द तम ्,
यरागम ् आ द इनक कुछ रचनाएं है । पंत और जी हंद और
मलयालम के का प नक क व है ।दोन क क वताओं म रह यवाद है ।जी क क वता
वेषण म टागौर के स दयवाद का प्रभाव है ।जो क व को लौ कक द ु नया से
अलौ ककता क ओर ले जाता है ।पंत क क वता मौन नमं ण क प्र य
जगत क
व तुओं के पीछे अलौ कक अ ात स ता का दशन है ।टागौर ने अनेक प्राथना गीत
लखे है ।इससे प्रभा वत होर पंत और जी ने बराबर प्राथना गीत क रचना क ।
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मलयालम के क वय म जी शंकर कु प का का य भी पंत जी के स श
उसी प्रकार सम ृ
एवं प्रतीक योजना से आपूण है ।दोन महाक व प्रतीक –योजना म
कुशल होने के साथ भाव और वचारभू म म भी
कु प
यापक वै व य रखते ह। जी शंकर
ब ब और प्रतीक के क व ह। इ ह ने पर परागत छ द वधान और सं कृत
न ठ भाषा को अपनाकर अपने च तन से का य ब ब के अनु प उसका प्रयोग
कया था।यह
प्रतीक योजना पंतजी क क वताओं म भी समान
है ।पंतजी और जी शंकरकु प को इस प्रकृ त ने स मो हत
उनके का य-सज
ृ न म प्रेरणा ोत हुई।
प्रकृ त के सौ य और उ
कया और यह प्रकृ त
प से दोन क व सचेत रहे थे और आकृ ट
भी।पंतजी का वचार यह था क प्रकृ त के सु दर
उसका उ
प से व यमान
प ह उसे अ धक लुभाया था।पर
प भी उ ह ने प रवतन नामक क वता म च त कया था। प्रकृ त क
संहारक शि त का जी ने भी पंत क ह तरह च ण कया है ।प्रकृ त ने इन दोन
क वय म रह यभावना भर द ।बाद म उससे ज नत िज ासा का समाधान ढूँढते हुए
उप नषद आ द भारतीय दशन क ओर झुके।पंत और कु प के प्रारं भक जीवन और
उस काल के जीवन से प्रा त प्रेरणा ोत म असाधारण साध य प्रा त होता है ।
प्रकृ त के अन त सुषमामय
व प के च ण जी ने सा ह य कौतक
ु ं क
क वताओं
वारा कया है ।पंत क वीणा, प लव क क वताएँ इसी गण
ु से यु त है ।
पंतजी क
प रवतन सं क क वता और जी क
अ वप्रतीक, और सप प्रतीक क वताएँ और
कला से संबि धत व ृ
प्रतीक,
न मष नामक क वता इस
ि ट से
मह वपण
ू है ।
प्रेमचंद और तक ष शवशंकर प लै
प्रग तवाद रचना और आलोचना के
लेकर आया।प्रग तवाद
सा ह य के उ व और
े
म सवथा नवीन
वकास म रा
ि टकोण
य और अंतरा
य
प रि थ तयाँ तो सहायक हुई, साथ ह छायावाद क जीवनशू य होती हुई यि तवाद
वायवी का यधारा क प्र त
या भी उसम
न हत थी।एक ओर भारतीय समाज म
उभरता हुआ जनसंकट था,तो दस
ू र ओर
स म मा सवाद दशन के आधार पर
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था पत सा यवाद था, जो वहाँ के वषम संकट और संधष से गुजरे जनजीवन को
बल दे रहा था और जो सामंतवाद और पँज
ू ीवाद क
सवहारा का अ धनायक व
वभी षकाओं को कुचल कर
था पत कर रहा था।भारतीय बु जीवी एक ओर अपने
समाज म उ प न अनेक सामािजक, आ थक, ध मक, राजनी तक
संकट को दे ख रहा था, दस
ू र ओर वह
गज
ु र कर एक ऐसी
यव था
वसंग तय और
स के उस समाज को दे ख रहा था जो इनसे
था पत कर रहा था, िजसम सामा य जनजीवन को
मह ता प्रा त हो रह थी। स म प्र ति ठत सा यवाद और पि चम के अ य दे श म
फैलता हुआ उसका मा सवाद दशन भारतीय बु जी वय के लए प्रेरणा-क द्र बन
रहा था।
हमारा रा
य वातावरण नवीन प रि थ तय के कारण एक नये
प्रकार के युयु साभाव से आंदो लत हो रहा था।राजनी तक दासता दे श म एक ओर
पँज
ू ीवाद और सामंतवाद क
शोषक शि तय
को प्रेरणा दे रह
थी, दस
ू र
ओर
जनसामा य के लए अपार भयावह गर बी, अ श ा, असु वधा, और अपमान क सिृ ट
कर रह थी।इसके अ त र त अकाल और यु
क भीषण वभी षकाएँ भी दे श को खा
रह थी।सा ह य भी उससे प्रभा वत हुआ और प्रग तवाद सा ह य का आंदोलन आरं भ
हुआ।सन ् 1935 म ई.एम फो टर के सभाप त व म पे रस म प्रो सीव राइटे स
एसो सयेशन नामक अंतरा
य सं था का प्रथम अ धवेशन हुआ।सन ् 1936 म
स जाद जह र और डॉ मु कराज आनंद के प्रय न से भारतवष म भी इस सं था क
शाखा खुल और प्रेमचंद क अ य ता म लखनऊ म प्रथम अ धवेशन हुआ।
छायावादो तर यग
हंद - ग य क सवागीण उ न त का युग है । का युग
ु
है । इस युग के लेखक ने कहानी,उप यास,आलोचना,आ द
े
म नये आयाम का
उ घाटन कया था। वाधीनता प्रा त करने से पव
ू जहाँ सा ह यकार ने रा
पर बल दया,वह ं
म ग य ह
य चेतना
वात यो तर सा ह य म नव नमाण पर बल दया गया।इस यग
ु
जनजीवन क
अ भ यि त का सवप्रमुख साधन रहा। फलतः ग य
सा ह य का सीमातीत व तार हुआ।क य क कला मक अ भ यि त के लए सवथा
नए प्रतीक,उपमान,अथवा बंब ह प्रयु त नह हुए ,अ पतु फलैशबैक,चेतना-प्रवाह आ द
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शै लय
का
भी प्रयोग
कया
गया।कथानक
को गौण
मानने तथा पा
का
मनोवै ा नक च ण करने क प्रविृ तय के फल व प वतमान लेखक मानव –मन के
सू म से सू म संवेदनाओं को अ भ य त करने म सफल हो सके ह।सम तः इस यग
ु
का ग य सा ह य क य और श प दोन
ि टय से पया त वै व यपण
ू एवं सम ृ
है ।
प्रेमचंद हंद सा ह य के यग
ु नमाता सा ह यकार है । प्रेमचंद यग
ु से ह
ह द
उप यास सा ह य जाना जाता है । सेवासदन,प्रेमा म, रं गभू म, कायाक प,
नमला, गबन, कमभू म,गोदान आ द इनके उप यास ह,और ब लदान, बढ
काक ,
ू
पर
ा, शतरं ज के खलाडी, पस
ू क रात, ठाकुर का कुआँ, ईदगाह, कफन आ द इनके
कुछ कहा नयाँ ह। प्रेमचंद ने अपने उप यास म समाज के व भ न वग का च ण
कया है ।इनम सबसे प्रमख
ु वग है - कसान का, जो मु यतः गांव म रहता था।
1912 म केरल के आल पुषा िजले
म तक ष
ज म हुआ था।मलयालम सा ह य म तक ष भी प्रेमचंद क
सा ह यकार के
प्र स
शवशंकरि प लै का
तरह यग
ु नमाता
प म जाना जाता है ।कु नाड के इ तहासकार के नाम से ये व व
है । इ ह ने लगभग छः सौ से अ धक कहा नयाँ और उनचाल स उप यास लखे
ह। इनके चे मीन अथात ् मछुआरा नामक उप यास का अनव
ु ाद कई दे शी और वदे शी
भाषाओं म हो चक
ु े ह।रि डड ङ ष, ए ण प डकल, कयर,तो यट
ु े मकन ्,अनभ
ु व गल
पा ल चकल,
यागि त टे प्र तपलम, अ चप
ु े णु गल आ द इनके अ य उप यास
ह।इसके अ त र त एक नाटक, या ा ववरण, तीन आ मकथाएं आ द भी इ ह ने लखे
ह।सा ह य के लगभग सभी
प्रेमचंद क
े
को इ ह ने छुआ है ।
रचना काल क
तरह तक ष क
रचनाकाल भी केरल म
सामंती प्रथा का समय था।नौकर शाह , र वतखोर , शोषण और दमन के च
आम जनता पस रह थी।राज शासन के व
म
, काँ स और सा यवा दय का संघष
हो रहा था।इन अ याचार के खलाफ जन आंदोलन हुए ले कन उसको दबाने का काम
सरकार क ओर से हो रहा था।केरल म पु नप्रवयलार म जो आंदोलन हुए उनम
सरकार के सपा हय ने जनता पर गो लय क वषा क ।इस आंदोलन म हजार लोग
मारे गए,1957 के चुनाव म कां स को परािजत कर के सा यवाद दल स ता म
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आया।सा यवाद सरकार ने श ा और खेती के
े
म अनेक प्रग तशील व उपयोगी
कानन
ू बनाए।इस प रि थ तय का प्रभाव तक ष के सा ह य पर भी पडा था।
तक ष के समय म समाज दो वग म वभािजत था-उ च वग एवं न न
वग।तक ष क रचनाओं म समाज के न नवग जैसे म छुआरा, भंगी, चमार, आ द
का च ण है ।इनके प्र स
उप यास चे मीन, म छुआर के जीवन का यथाथ च ण
है ।सागर एवं सागर तट इनके जीवन से कतना जड
ु ा हुआ है इसका च ण
दय को
छूनेवाला ह है । रि डड ङ ष अथात ् दो सेर दान उप यास म कु नाड के मजदरू का
जीवन संघष व वहाँ क प रि थ तयाँ च त है । समाज के शो षत वग के प्र त ये
िजतना सजग व संवेदनशील था उतनी ना रय के प्र त भी थे।नार के व भ न
का
च ण उ ह ने अपने उप यास
अ चुपे नङ
ु गल क जानक
म
कया है । म छुआरे उप यास क
यागि त टे प्र तफलम क पा
जीवन के
व भ न पहलुओं को प्र तत
ु करने वाल
सा यवाद
वचारधारा का प्रचार प्रसार
जनजीवन का सह
कु
प
च क
अ मा आ द नार
है ।इ ह ने सा ह य के
कया है और इनके उप यास
वारा
म केरल य
च ण पया त मा ा म व यमान है ।
तक ष के समान प्रेमचंद भी मानवतावाद
वचार से यु त सा ह यकार
थे।चार ओर फैले हुए जीवन र अनेक साम यक सम याओं – पराधीनता, जमींदार ,
पँज
ू ीप तय और सरकार कमचा रय
वारा
कसान का शोषण,
अंध व वास, दहे ज क कुप्रधा, घर और समाज म नार
िजंदगी, व ृ
नधनता ,अ श ा,
क ि थ त, वे याओं क
ववाह, वधवा सम या, सांप्रदा यक वैमन य, अ प ृ यता, म यमवग क
कंु ठाएं आ द ने उ ह उप यास –लेखन के लए प्रे रत कया था। सेवासदन म ववाह से
जड
ु ी सम याओं और
और व ृ
समाज म वे याओं क ि थ त पर रहा। नमला म दहे ज प्रथा
ववाह, प्रेमा म और गोदान म कृषक जीवन क सम याय, रं गभू म और
कमभू म म
ामीण क ि थ त आ द का
समाज यथाथ च ण आदश के साथ प्र तुत
च ण कर प्रेमचंद
ने उस समय के
कया है ।
ये दोन सा ह यकार सामािजक यथाथ के सरोकार थे और भाषाओं म
अंतर होते हुए भी इनम अ तशय समानताएँ है । दोन मानवतावाद थे और नार के
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प्र त इनका
ि टकोण उ च व प्रग तशील थे। समाज के हर
े
के ना रय के प्र त
ये संवेदनशील रहे थे।दोन क रचन म द लत चेतना और नार चेतना क शुभारं भ
दखाई पडती थी।ये दोन अपनी मानवतावाद
वचार से समाज को ऊपर उठाने क
को शश म थे इस लए इ ह युग नमाता सा ह यकार के
सि चदानंद ह रानंद वा
प म प्रासं गक भी है ।
यायन अ य
े और अ य प प न कर
के लए
प्रयोग तो प्र येक युग म होते ये ह, क तु प्रयोगवाद नाम उन क वताओं
ढ हो गया ह, जो कुछ नये बोध ,संवेदनाओं तथा उ ह प्रे षत करने वाले
श पगत चम कार को लेकर शु - शु
म तार स तक के मा यम से सन ् 1943 म
प्रकाशन-जगत ् म आयीं, और जो प्रग तशील क वताओं के साथ वक सत होती गयीं
तथा िजनका पयवसान नयी क वता म हो गया। नयी क वता भारतीय
वतं
ता के
बाद लखी गयी उन क वताओं को कहा गया, िजनम परं परागत क वता से गे नये
भावबोध क अ भ यि त के साथ ह नये मू य और नये श प वधान का अ वेषण
कया गया।नयी क वता म
ण क अनुभू तय को लेकर बहुत –सी मम पश और
वचार- प्रेरक क वताएं लखी गयी ह।नयी क वता जीवन के एक- एक
ण को स य
मानती है और उस स य को परू हा दकता और परू चेतना से भोगने का समथन
करती है ।इस क वता का प रवेश अपने यहाँ का जीवन है ।
म
डॉ. के अ य प प न कर का ज म 1930 म केरल के आल पष
ु ा िज ले
हुआ था।उ च
श ा अम रका से लेकर
ये अंगेजी के प्रा यापक रहे थे।
मलयालम क वता को आधु नकता एवं उ तर आधु नकता क ओर ले जाने म का
ेय
इनको ह है । आधु नक मलयालम क वता का सू पात 1960 म प्रका शत प न कर
क कु
े
नामक क वता से ह माना जाता है । सव इि द्रय
अनभ
ु ू त है ऐसा वह
मानते थे ।ये क व के साथ-साथ प्र स
परु ानी मा यताओं से क वता को बाहर
को छूना ह का य
आलोचक भी थे।उन
नकालकर नयी राह से चलाना ह उनका
ल य रहा था। नरं तर नवीन प्रयोग व को शश से इ ह ने मलयालम क वता को व व
सा ह य मे
थान
दलाया।अनेक
व व सा ह य स मेलन
म मलयालम का
प्र त न ध व कर अपनी भाषा को वैि वक मान दलाया था।
Comparative Literature
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ए टे
कु
े म ्,
भि तमेल, ओ
सर
रय ल ट प्रेमगानम ्, कु नाडन
यङगल,
यामम ्, म ृ युपज
ू ा, कुटुंब पुराणम ्, गो यानम ्, वला, क न मा, श भ
ु यम ्,
वी डयो मरणम ्, दख
ु मो सखी, पू का त र काने न काव त ले आ द इनक कुछ कृ तयाँ
ह।इनके अ त र त इ ह ने कई लेख व आलोचना मक पु तक भी लखे ह।
अ ेय का ज म दे व रया म हुआ था। श ा के बाद ये जोधपुर
व व व यालय म कायरत थे।कई बार सां कृ तक काय के लए अम रका गये
थे।क व के साथ-साथ ये प्र यात कथाकार, समी क और
ह।तारस तक,दस
ू रा स तक, तीसरा स तक, चौथा स तक औ
चंतक- वचारक भी
र
पांबरा
इनके
संपा दत का य संकलन है ।ये प्रयोगवाद और नयी क वता के व श ट क व ह।उनका
वर अहं से लेकर समाज तक, प्रेम से लेकर दशन तक,आ दम गंध से लेकर व ान
क चेतना तक, यं - स यता से लेकर लोक-प रवेश तक, यातना बोध से लेकर वद्रोह
क ललकार तक, प्रकृ त स दय से लेकर मानव सौ दय तक फैला हुआ है ।अ ेय म
संवेदना के साथ एक सजग बौ कता है ।
इ यलम,हर घास पर
ण भर, बावरा अहे र , इ द्रधनु र दे हुए थे, अर
ओ क णा प्रभामय, आंगन के पार वार, कतनी नाव म कतनी बार, सागरमद्र
ु ा,
य क म उसे जानता हूँ,पहले स नाटा बन
ु ता हूँ आ द इनक प्र स का य रचनाएँ ह
और शेखर एक जीवनी, नद के वीप, अपने अपने अजनबी इनके तीन उप यास
ह। शंकु, आ मनेपद, और हंद सा ह यःएक आधु नक प र
य आ द इनके नब ध
सं ह ह।अ ेय ने कुछ नब ध कु चा तन के नाम से भी लखे ह।
अ ेय और अ य प प न कर क रचनाकाल हंद व मलयालम सा ह य
म छायावाद
व छ दतावाद का प नक का यधारा का प्रभाव था।अतः अ ेय क
तरह प न कर क भी प्रारं भक क वताओं म सी शैल का प्रभाव है ,जैसे दोन क
प्रारं भक रचनाएँ प्रकृ त, प्रणय, और सौ दय पर केि द्रत थी।पर यह शैल अ धक
समय तक नह ं रहा।दोन क व अपनी- अपनी भाषाओं म नये नये प्रयोग क खोज
करने लगे।इस प्रकार क वता म नत
ू न प्रयोग को अपनाकर ये दोन सा ह य के
म आधु नकता के प्रवतक बन गये।
प्रयोगवाद नयी क वता भाषा और का य
े
प म नया प्रयोग है ।अं ेजी
क व ट .एस.इ लयट का प्रभाव इस का य धारा पर पडा।प न कर और अ ेय दोन
Comparative Literature
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क वय क क वताओं म इ लयट का प्रभाव पडा है और दोन म अि त ववाद दशन
है ।सलंबी क वता से लेकर है कू जैसी छोट
क वता भी दोन ने लखी ह।चींट , प
,
गाय, जैसी प न कर क क वताएं तथा साँप, गधा, जैसी अ ेय क क वताएं अपने
छोटे आकार म समकाल न यथाथ को अ भ य त करते है । प्रयोगवाद क वता श प
क
ि ट से नये प्रयोग क क वता है ।जीवन से उभरनेवाले प्रतीक और ब ब का
प्रयोग इस क वता क
नत
ू न
वशेषता है ।अ ेय और प न कर भाव का अनावरण करने वाले
ब ब का प्रयोग
कया।परं परागत सु दर
ब ब को छोडकर कालो चत नये
प्रयोग दोन ने कया।अ ेय क क वता कलगी बाजरे क और बावरा अहे र आ द इस
दि ट से यग
ु ा तरकार क वता है ।इन दोन ने आधु नक समाज के ढ ग पाखंड, छलकपट और नगर सं कृ त क
वद्रप
ू ताओं का पदाफाश करती है ।
रवी द्रनाथ ठाकुर
व व क व रवीं द्र ने व तुतः
प्राि त म अपना बहुमू य
वयं आधु नक भारतीय क वय के गु व प है ।उ ह ने सम त
योगदान दया है ।वे
वरा य क
भारतवष को अपने गान से सचैत य कर दया था। महा मागाँधी ने अपने अ हंसक रा
– जीवन से जो अतु य सेवा ज मभू म को अ पत क वैसी ह सेवा क ववर रवीं द्र ने
अपने स वर गायन से क है ।
आकां ा
को
अपनी
एक क व के
अनभ
ु ूत
वारा
प म उ ह ने समाज के सुख-दख
ु , आशा-
समझा
था
और
उनपर
च तन
था। व व व यात क व सा ह यकार,दाश नक और भारतीय सा ह य के एकमा
कया
नोबल
परु कार वजेता ह।बांगला सा ह य के मा यम से भारतीय सां कृ तक चेतना म नयी
जान फँू कने वाले यग
टा थे। वे ए शया के प्रथम नोबेल परु कार स मा नत यि त ह।
ु
उनक
प्रका शत कृ तय
कहानी, शशु भोलानाथ,क णका,
म गीतांजल , गीताल ,गी तमा य, कथा ओ
णका खेया आ द प्रमुख है । मनु य और ई वर के
बीच जो चर थायी स पक है ,उनक रचनाओं के अंदर वह कई
प म उभर आता है ।
सा ह य क शायद ह ऐसी कोई शाखा हो,िजनम उनक रचना न हो- क वता, गान,
कथा,उप यास, नाटक,प्रब ध, श पकला- सभी वधाओं म उ ह ने रचना क । उ ह ने
कुछ पु तक का अं ेजी म अनव
ु ाद भी कया। अँ ेजी अनव
ु ाद के बाद उनक प्र तभा
परू े व व म फैल थी। गीतांजल का अँगरे जी भाषा म अनुवाद कर इ ह ने अपनी
प्र तभा को परू े व व म फैलाया था।
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जवाब ल खए—
1. पंतजी क रचनाएँ कौन-कौन सी ह।
उ
वास, ं थ,
वण करण,
वीणा,
और
गुंजन,
यग
ु ांत,
युगवाणी,
ा या,
वणधू ल, उ तरा, रजत शखर, वाणी, पतझर आ द उनक रचनाएँ ह।
2. छायावाद क वता क
छायावाद
चदं बरा,प लव,
वशेषताएँ
या
या ह।
क वता सपाट बयानी से हटकर ला
णकता और आदश क
नै तक
श दावल को छोडकर रह य, अ या म, प्रेम प्रकृ त मनोजगत ् और सौ दयवणन को
लेकर चल थी।जगत ् के
यमान पदाथ पर अ या मपरक
आरोप कर वणन करना इस शैल
का यप्रविृ तयां भी इस का य म
क
ि ट से चेतन स ता का
क वता म प्रमुख हो गया था।रोमांि टक
या त थी।फलतः इस शैल क क वता का नाम
ह द म छायावाद हो गया।
3. जी शंकर कु प का प रचय द िजए।
गो व द शंकर कु प या जी शंकर कु प
मलयालम भाषा के प्र स
क व ह। उनका
ज म केरल म हुआ था। महाक व का लदास क क वताओं से प्रभा वत होकर वे का य
के
े
म आये। अ यापन काय के साथ-साथ अं ेजी भाषा तथा सा ह य का अ ययन
कया। उनक
प्र स
रचना ओट कुषल अथात बाँसुर
ानपीठ परु कार
वारा
स मा नत हुइ है ।
4. सु म ानंदन पंत का प रचय द िजए।
सु म ानंदन पंत का ज म
हमालय के अ मोङा िज ले के कौसानी
ाम म हुआ
था।पंत जी क पहल क वता गरजे का घंटा सन ् 1916 क रचना है । तब से वे
नरं तर का य साधना म त ल न ह।उनके का य
ंथ ह –उ
वास, ं थ, वीणा,
चदं बरा,प लव, और गुंजन, यग
ु ांत, यग
ु वाणी,
वण करण,
वणधू ल, उ तरा,
रजत शखर, वाणी, पतझर आ द। चदं बरा पर 1968 म भारतीय
ानपीठ परु कार
ा या,
उ ह प्रा त ह।
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5. जी शंकर कु प क कुछ कृ तय का नाम ल खए।
सा ह य कौतुकम ् ,सूयकां त
,ओट कुषल,
प थकंटे
,मू न वयम
ु ् ओ
सा
, न मषम ्, चक त कल ् मु तुकल ्, वनगायकन ् ,इतलुकल ्
पा ु ,
वेि ल
परवकल ्,
व वदशनम ्
,जीवन
संगीतम ्
पु यम
ु ् ,पाथेयम ् , ,मधरु म ् सौ यम ् द तम ्, वे ल चि तंटे दत
ू म ्,
यरागम ् आ द ।
6. प्रेमचंद का प रचय द िजए।
प्रेमचंद हंद सा ह य के यग
ु नमाता सा ह यकार है । प्रेमचंद यग
ु से ह
ह द उप यास
सा ह य जाना जाता है । सेवासदन,प्रेमा म, रं गभू म, कायाक प,
नमला, गबन,
कमभू म,गोदान आ द इनके उप यास ह,और ब लदान, बढ
ू काक , पर
ा, शतरं ज के
खलाडी, पूस क रात, ठाकुर का कुआँ, ईदगाह, कफन आ द इनके कुछ कहा नयाँ ह।
प्रेमचंद ने अपने उप यास म समाज के व भ न वग का च ण कया है ।
7. व व क व रवीं द्र जी व व सा ह यकार के नाम से
व व क व रवीं द्र ने व तुतः
है ।वे
य जाना जाता है ।
वरा य क प्राि त म अपना बहुमू य योगदान दया
वयं आधु नक भारतीय क वय के गु
व प है ।उ ह ने सम त भारतवष को
अपने गान से सचैत य कर दया था। महा मागाँधी ने अपने अ हंसक रा
– जीवन
से जो अतु य सेवा ज मभू म को अ पत क वैसी ह सेवा क ववर रवीं द्र ने अपने
स वर गायन से क है ।
आकां ा
को
अपनी
एक क व के
अनभ
ु ूत
वारा
प म उ ह ने समाज के सख
ु -दख
ु , आशासमझा
था
और
उनपर
च तन
था। व व व यात क व सा ह यकार,दाश नक और भारतीय सा ह य के एकमा
कया
नोबल
परु कार वजेता ह।बांगला सा ह य के मा यम से भारतीय सां कृ तक चेतना म नयी
जान फँू कने वाले युग
टा थे। वे ए शया के प्रथम नोबेल पुर कार स मा नत
ह। इस लए रवी द व व क व के
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यि त
प म जाना जाता है ।
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